शिक्षा केवल पढ़ाई,रोजगार ही नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों का निर्माण करने वाले जिम्मेदार नागरिक पैदा करती है
शिक्षा सामाजिक न्याय का सशक्त साधन है। शिक्षक सिर्फ़ जानकारी देने वाला ही नहीं,एक मार्ग दर्शक और संवाद करने वाला भी होना चाहिए : प्रो.अपूर्वानंद
जनतंत्र में शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं,विवेक का विकास भी : डॉ.जे. एन.टंडन
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा : 6 अप्रेल,आज़ादी के सिपाही, मार्क्सवादी विचारक,भारतीय संस्कृति के हामी, पीड़ित, शोषित, मजदूर, किसानो के हिमायती,सांप्रदायिक ताकतो के घोर विरोधी, हर दिल अज़ीज़ का.महादेव नारायण टंडन की 23 वीं पुण्यतिथि का माथुर वैश्य सभागार,पचकुइयां में परम्परागत रूप से आयोजन किया गया।
व्याख्यान क्रम मे इस बार 'जनतंत्र में शिक्षा शास्त्र' विषयक व्याख्यान की शुरुआत डॉ.जी.यू. कुरैशी, पूर्व प्राचार्य एस.एन.मेडिकल कॉलेज,अतिथि वक्ता प्रो.अपूर्वानंद, का.पूरन सिंह,भावना जितेंद्र रघुवंशी द्वारा कामरेड टंडन के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्प्पांजलि कर हुई।
उपस्थित जन के स्वागत सहित विषय प्रवर्तन करते हुए का. डॉ. जे. एन. टंडन ने कहा कि जनतंत्र में शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं, विवेक का विकास है.यह असहमति को सहने की क्षमता, विविधता को अपनाने की संस्कृति और संविधान के मूल्यों की समझ देती है। जब शिक्षा स्वतंत्र,समावेशी और नैतिक होगी तभी जनतंत्र सशक्त, सजग और स्थायी होगा।
जनतंत्र शिक्षा शास्त्र विषयक के अतिथि वक्ता प्रो.अपूर्वानंद ने अपने व्याख्यान में कहा कि शिक्षा केवल पढ़ाई की तकनीक नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक - राजनैतिक और मानवीय दृष्टिकोण है.जिसका मकसद केवल रोजगार दिलाना ही नहीं,अपितु ऐसे जागरूक नागरिक बनाना भी है,जो समाज को समझकर,जानकर सवाल करके लोकतान्त्रिक मूल्यों को मजबूत भी करे. जिसके लिए शिक्षा शास्त्र के द्वारा छात्रों में सोचने और सवाल करने की छमता को विकसित करना है. रटने वाली शिक्षा से शिक्षा का पतन ही होता है। इसलिए शिक्षा में भाषा बहुत महत्वपूर्ण है। छात्रों को अपनी भाषा में सोचने और अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए,ताकि वें सच में ज्ञान को आत्मसात कर सके।
उन्होंने कहा कि ये भी ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा तटस्थ नहीं होती।पाठ्यक्रम,किताबें और पढ़ाने का तरीका सब किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित होते है,इसलिए शिक्षा को समझते समय यह देखना जरुरी कि क्या पढ़ाया जा रहा है और क्यों पढ़ाया जा रहा है.क्योंकि शिक्षा सामाजिक न्याय का साधन भी है.शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो जाति, धर्म, और लिंग के आधार पर भेदभाव को कम करे।इसलिए शिक्षक सिर्फ़ जानकारी देने वाला ही नहीं एक मार्ग दर्शक /मेंटोर और संवाद करने वाला होना चाहिए, छात्रों के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत करने वाला होना चाहिए।
अतिथि वक्ता प्रो.अपूर्वानंद को स्मृति भेट महादेव नारायण टंडन के अनुज पुत्र आई. ए.एस. ब्रिजेंद्र नारायण टंडन द्वारा दी गई। आभार कामरेड पूरन सिंह ने दिया। संचालन प्र.समाजसेवी हरीश चिमटी ने किया।
इस मौके पर दिल्ली से पधारे बलराम शर्मा की उपस्थिति उल्लेखनीय रही, जिनके पास का.टंडन द्वारा महात्मा गाँधी का लिया गया इंटरव्यू जो हिंदी अंग्रेजी में अखबारो में प्रकाशित हुआ,जिसकी दुर्लभ प्रति आज़ भी मौजूद है।
कार्यक्रम में रामनाथ गौतम, दिलीप रघुवंशी, डॉ. वी आर सेंगर, डॉ.राकेश भाटिया,डॉ.अजय कालरा,डॉ.अशोक शर्मा,डॉ.नसरीन बेग़म,डॉ अनुपमा शर्मा,डॉ. संजय चतुर्वेदी,राजीव सक्सेना,शरीफ उस्मानी,नीरज स्वरुप, डॉ.पंकज नागाइच,डॉ एस एस सूरी, डॉ अनूप दीक्षित,डॉ.सुधीर धाकरे,डॉ विजय कत्याल, डॉ मुकेश भारद्वाज, राम नाथ शर्मा, सीमंत साहू,अमीर अहमद,डॉ.रजनीश गुप्ता,मोहित शर्मा,डॉ. मधुरिमा शर्मा,नीरज मिश्रा,डॉ. मुनिशवर गुप्ता, डॉ. अरुण चतुर्वेदी,हरि सिंह यादव,डॉ.ओ.पी.यादव,रामनाथ गौतम,डॉ अनूप दीक्षित आदि प्रमुख रूप से उपस्थिति रहे।







