सर्वे में मोदी सबसे आगे,विपक्ष के सामने चेहरा,संगठन और जमीन-तीनों की चुनौती
हिन्दुस्तान वार्ता।✍️ धर्मेन्द्र कुमार चौधरी
राजनीति में एंटी-इनकंबेंसी कोई नई चीज नहीं है। सत्ता जितनी लंबी होती है, उससे ऊबने की संभावना उतनी ही बढ़ती है। लोकतंत्र का स्वभाव ही ऐसा है-आज का नायक कल सवालों के घेरे में हो सकता है। लेकिन नरेंद्र मोदी के मामले में कहानी अभी कुछ अलग दिखाई देती है।
हालिया इंडिया टुडे सर्वे ने भारतीय राजनीति की इसी दिलचस्प तस्वीर को सामने रखा है। सर्वे के आंकड़े यदि सही हैं तो फिलहाल मोदी के सामने विपक्ष की चुनौती वैसी नहीं है, जैसी बारह साल की सत्ता के बाद किसी सरकार के सामने सामान्यतः होनी चाहिए।
मोदी अभी भी मुकाबले से काफी आगे हैं :
हाल ही में दिल्ली में एक इजरायली नागरिक से मुलाकात हुई। सहज अनुमान था कि जिस तरह भारत में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता है, उसी तरह इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू भी लोकप्रिय होंगे। लेकिन बातचीत ने तस्वीर बदल दी। नेतन्याहू के खिलाफ उसके तर्कों में जबरदस्त एंटी-इनकंबेंसी थी।
दुनिया के अधिकांश लोकतंत्रों में यही कहानी है। सत्ता विरोधी भावना धीरे-धीरे बनती है और अंततः चुनाव में सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोलती है। भारत में भी यह नियम लागू हुआ है। लेकिन मोदी इस समय इस राजनीतिक नियम का अपवाद दिखाई देते हैं। भारत में लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रधानमंत्रियों की सूची बहुत छोटी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी ही दो ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई।लेकिन यहां एक दिलचस्प राजनीतिक तुलना बनती है।
नेहरू के बारहवें वर्ष तक कांग्रेस की राजनीतिक चमक उतरने लगी थी। राज्यों में पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ रही थी। दूसरी तरफ मोदी के बारहवें वर्ष में भाजपा उन राज्यों में भी सत्ता तक पहुंच रही है, जहां कभी पार्टी का राजनीतिक अस्तित्व बेहद सीमित था। इसका मतलब साफ है-मोदी फैक्टर अकेला नहीं है, उसके पीछे भाजपा का संगठन और कार्यकर्ता भी पूरी ताकत से खड़ा है और यह छोटी उपलब्धि नहीं है।
बारह साल सत्ता में रहकर भी संगठन को विस्तार देना, चुनावी मशीनरी को सक्रिय रखना और लगातार नए राज्यों में राजनीतिक जमीन तैयार करना किसी भी दल के लिए कठिन काम है,लेकिन यहां मोदी के सामने एक दूसरी सच्चाई भी है।
राजनीति में कोई शिखर स्थायी नहीं होता :
आज लोकप्रियता आसमान पर है तो कल उसमें कमी आ सकती है। यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। इसलिए मोदी की लोकप्रियता में भविष्य में मामूली गिरावट को भी किसी बड़े राजनीतिक भूचाल के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।असल सवाल यह है कि विपक्ष उस गिरावट का फायदा उठाने की स्थिति में है या नहीं। यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है।
इंडिया टुडे के सर्वे में मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में 49 प्रतिशत लोगों की पसंद बताया गया है। दूसरे संभावित चेहरे उनसे काफी पीछे हैं। यह आंकड़ा जितना मोदी के लिए राहत है, विपक्ष के लिए उतना ही बड़ा सवाल। क्या विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले ऐसा चेहरा है, जिसे देश का मतदाता प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार है ?
यदि सर्वे सही है तो जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं दिखाई देता,लेकिन यहां सर्वे पर सवाल उठाना भी जरूरी है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सर्वे दिशा का संकेत दे सकता है, अंतिम सत्य नहीं। तीन महीने पहले बने किसी मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में देश का बड़ा हिस्सा स्वीकार कर रहा है-यदि यह आंकड़ा वास्तविक है तो विपक्ष के लिए यह बेहद गंभीर राजनीतिक संकेत है और यदि यह आंकड़ा जमीन की वास्तविकता नहीं है तो फिर सवाल सर्वे करने वालों से पूछा जाना चाहिए क्योंकि चुनाव टीवी स्टूडियो में नहीं होता,चुनाव जमीन पर होता है।
सोशल मीडिया की आंधी और जमीन की खामोशी :
भारतीय राजनीति का अगला बड़ा मुकाबला यहीं है। 2014 में सोशल मीडिया एक नया राजनीतिक हथियार था। जिसने इसे जल्दी समझ लिया, उसे भारी फायदा मिला। आज सोशल मीडिया सबके पास है। हर पार्टी के पास आईटी सेल है, डिजिटल योद्धा हैं, वीडियो हैं, नैरेटिव हैं और ट्रेंड हैं। अब सोशल मीडिया किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। इसलिए 2029 में केवल सोशल मीडिया की ताकत से चुनाव जीतने की उम्मीद रखना राजनीतिक भूल होगी।
पश्चिम बंगाल में सोशल मीडिया पर अलग माहौल दिखाई देता था, लेकिन जमीन का फैसला अलग निकला। महाराष्ट्र में भी डिजिटल नैरेटिव और वास्तविक चुनावी राजनीति के बीच अंतर देखने को मिला।इससे एक सबक साफ है-सोशल मीडिया माहौल बना सकता है, लेकिन बूथ पर वोट नहीं डाल सकता।
वह प्रचार कर सकता है,मतदाता के घर तक संगठन की जगह नहीं पहुंच सकता। वह नैरेटिव बना सकता है, लेकिन हर गांव, हर वार्ड और हर बूथ पर कार्यकर्ता का विकल्प नहीं बन सकता।यही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है और विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी भी।
विपक्ष के पास नाराजगी है,लेकिन विकल्प ?
विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दे गिनाने में सक्षम है। सोशल मीडिया पर उसके पास बड़ी आवाज है। सरकार की आलोचना करने वालों की संख्या भी कम नहीं है,लेकिन चुनाव केवल सरकार से नाराज लोगों की संख्या से नहीं जीता जाता।उन्हें एक साथ जोड़ने वाला नेतृत्व चाहिए। उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाने वाला संगठन चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण-उन्हें यह भरोसा चाहिए कि सत्ता बदलने के बाद मिलेगा क्या। यहीं विपक्ष अभी सबसे कमजोर दिखाई देता है।
यदि विपक्ष केवल मोदी विरोध को अपनी राजनीति का आधार बनाएगा तो यह पर्याप्त नहीं होगा। मतदाता को केवल यह बताना कि वर्तमान सरकार गलत है, काफी नहीं है। उसे यह भी बताना होगा कि आप बेहतर क्या करेंगे।
2029 का चुनाव असली परीक्षा होगा। 2029 में मुकाबला केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं होगा। मुकाबला होगा- जमीन बनाम सोशल मीडिया।संगठन बनाम नैरेटिव।जनसंपर्क बनाम डिजिटल प्रचार। जो दल जमीन पर होगा, वही निर्णायक बढ़त हासिल करेगा।
मोदी के सामने भी चुनौती कम नहीं है। बारह वर्ष की सत्ता के बाद हर सरकार को जनता के सवालों का जवाब देना पड़ता है। लोकप्रियता बड़ी पूंजी है, लेकिन राजनीति में पूंजी खर्च भी होती है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि मोदी की लोकप्रियता के साथ-साथ संगठन की विश्वसनीयता भी बनी रहे। केवल एक चेहरे पर निर्भर राजनीति लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रहती।
विपक्ष को इससे भी कठिन काम करना है। उसे मोदी को हराने से पहले मोदी का विकल्प बनना होगा,और यह काम ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम या एआई के जरिए नहीं होगा। इसके लिए गांव की चौपाल में जाना होगा। शहर की गलियों में जाना होगा। बूथ पर बैठना होगा। कार्यकर्ता खड़ा करना होगा। मतदाता से आंख मिलाकर बात करनी होगी।
अंतिम फैसला सर्वे नहीं, जनता करेगी :
आज मोदी सबसे आगे हैं-यह सर्वे का संकेत है। कल भी सबसे आगे रहेंगे-यह भविष्यवाणी है और भविष्यवाणी राजनीति में सबसे जोखिम भरा काम है। लोकतंत्र का अंतिम फैसला सर्वे नहीं करता। टीवी चैनल नहीं करते। सोशल मीडिया नहीं करता। एआई नहीं करता।
अंतिम फैसला मतदाता करता है। यही कारण है कि 2029 अभी बहुत दूर है।आज मोदी के पास लोकप्रियता है, भाजपा के पास संगठन है और विपक्ष के पास सत्ता विरोधी मुद्दे। अब देखना यह है कि 2029 तक इनमें से कौन अपनी ताकत को वोट में बदल पाता है। क्योंकि चुनाव के दिन सोशल मीडिया की पोस्ट नहीं गिनी जाएगी। गिनी जाएगी ईवीएम में पड़ी हुई जनता की उंगली। और वही बताएगी कि बारह साल बाद भी मोदी का दम कायम है या एंटी-इनकंबेंसी ने आखिरकार अपना काम कर दिया।
( लेखक 'यू.पी.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन' के प्रदेश सचिव हैं )

