सूरदास जयंती (20अप्रैल 2026) पर विशेष



महाप्रभु बल्लभाचार्य ने सूरदास को गऊघाट पर दी थी दीक्षा

रुनकता में सूरकुटी पर तीन दिन किया था प्रवास

हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️आदर्श नंदन गुप्ता 'वरिष्ठ पत्रकार'

आगराः ब्रज में वैष्णववाद के कृष्ण केंद्रित पुष्टिमार्ग के संस्थापक, कृष्ण भक्त और महान दार्शनिक महाप्रभु बल्लभाचार्य ने रुनकुता स्थित सूरकुटी के गऊ घाट पर तीन दिन तक प्रवास किया था। यहीं पर उन्होंने महाकवि सूरदास को दीक्षा दी और श्रीनाथजी की सेवा सूरदास जी को सौंप दी थी। उसके बाद सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के पदों का सृजन किया।

आगरा-मथुरा रोड पर एक गांव है रुनकुता (रेणुका), जहां सूरदास की साधना स्थली सूरकुटी है। वहां अभी भी वह कुटिया है, जहां सूरदास साधना करते थे। “अभा हिंदी प्रकाशक संघ” द्वारा 23 दिसंबर 1958 में प्रकाशित “आगरा एक सांस्कृतिक परिचय” पुस्तक के अनुसार रेणुका का गऊ घाट, जो कभी गोपांचल के नाम से प्रसिद्ध था, यहां सूरदास आकर रहने लगे थे। यहीं पर भारत भ्रमण करते हुए महाप्रभु बल्लभाचार्य जी आए। सूरदास,बल्लभाचार्य जी के साथ ही गोवर्धन चले गए थे। बल्लभाचार्य. सूरदास की भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि श्रीनाथजी के मंदिर का सेवा कार्य उन्हें सौंप दिया। यहां वे रोज पद लिखते थे। इस प्रकार उन्होंने यहां एक लाख पदों की रचना की।

साहित्यकार स्व.सतीशचंद चतुर्वेदी द्वारा लिखित पुस्तक “आगरा नामा” में भी गऊ घाट की चर्चा है। उसमें लिखा है कि-जब सूरदास जी सन  1510 यहां गऊ घाट पर आए थे, तब उनकी उम्र 19 वर्ष थी। तीन दिन रह कर अपने साथ सूरदासजी को गोवर्धन ले गए थे। “पुष्टिमार्गीय गिर्राजधरण पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट” द्वारा प्रकाशित “आगरा के वैष्णवजन” स्मारिका में संस्कृत मनीषी डा.चंदनलाल पाराशर ने अपने आलेख में भी बल्लभाचार्य जी के आगमन का उल्लेख किया है।

“सूरकुटी परिचय” पुस्तक में ब्रज के प्रमुख साहित्यकार डा.प्रभुदयाल मित्तल (मथुरा) के आलेख के अनुसार सूरदास को युवावस्था में ही घर से विरक्ति हो गई थी और विभिन्न स्थानों पर होते हुए गऊ घाट आए और प्रवास करने लगे थे।

“आगरा जनपद का राजनैतिक इतिहास” (लेखक-स्व.चिंतामणि शुक्ल, मथुरा) में तो महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के आगरा निवासी शिष्यों की भी चर्चा है। उसके अनुसार उनके कृपा पात्र शिष्यों में गज्जन क्षत्रिय रहे। उनके बारे में “चौरासी वैष्णवों की वार्ता” में भी उल्लेख है। आगरा के दूसरे शिष्य रहे पुरुषोत्तम दास, जिनके यहां महाप्रभु के पुत्र एवं अष्टछाप के संस्थापक गुसाईं बिट्ठलनाथ ने भी प्रवास किया था। आगरा में संत दास चौपड़ा, नारायण दास गौड़ भी शिष्य थे।

1928 में हुई सूरकुटी की खोज :

सेंट जोंस कालेज के प्रो.हरिहरनाथ टंडन ने वर्ष 1928 में सूरकुटी की खोज की। उसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक सर जान मार्शल ने इस स्थल का सूरकुटी घोषित किया। अध्यापक राम रत्न, महेंद्रजी, अयोध्या प्रसाद पाठक, पं.केदारनाथ भट्ट, पं.ब्रजनाथ गोस्वामी, पं.श्रीराम शर्मा, पं.श्रीनारायन चतुर्वेदी, पं.बनारसी दास चतुर्वेदी आदि ने इसका प्रचार किया और जीर्णोद्धार में सहयोग कराया। स्वाधीनता सेनानी स्व.डा.सिद्धेश्वरनाथ श्रीवास्तव जीवन पर्यंत इसके विकास में जुटे रहे। आजकल सूरकुटी पर सूरदास नेत्रहीन विद्यालय भी संचालित है।

हिंदी के साहित्यकारों का आगमन :

सूरकुटी पर समय-समय पर साहित्यकारों का भी आगमन हुआ। साहित्यकार महादेवी वर्मा भी एक बार यहां पधारी थीं। इनके अलावा अन्य साहित्यकारों की संगोष्ठियां यहां होती रही थी ।

सूर स्मारक मंडल की पदाधिकारी चिंता व्यक्त करते हैं कि धार्मिक स्थलों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। सबके हाल-बेहाल होते जा रहे हैं। करोड़ों रुपया आ रहा है,पर उसका सदपयोग नहीं हो रहा है। पौराणिक मंदिरों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

चित्र परिचय : महाकवि सूरदास की साधना स्थली सूरकुटी, रुनकुता पर विख्यात साहित्यकार महादेवी वर्मा जी। (फोटो-साहित्यकार डा.जयसिंह नीरद जी के सौजन्य से।)

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