हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️शाश्वत तिवारी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है। जब सरकार सुनती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, लेकिन जब संवाद की जगह केवल एकतरफा संदेश रह जाते हैं, तब असंतोष सड़कों पर दिखाई देने लगता है। हाल के घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि समय रहते संवेदनशील संवाद हो जाता तो परिस्थितियाँ शायद इतनी तनावपूर्ण नहीं बनतीं।
दिल्ली की सड़कों पर छात्रों का आक्रोश, संसद की ओर बढ़ता मार्च, सोनम वांगचुक का लंबा अनशन और पुलिस के साथ टकराव केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं। ये उस गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति हैं, जो वर्षों से परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही को लेकर युवाओं के मन में पनप रहा है। NEET परीक्षा से जुड़े विवादों और उसके बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि संवाद में देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को टकराव की ओर धकेल सकती है।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष करोड़ों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। अकेले NEET-UG में ही 20 लाख से अधिक अभ्यर्थी परीक्षा देते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर उठने वाला हर प्रश्न करोड़ों परिवारों के विश्वास से जुड़ जाता है।
बीते कुछ वर्षों में कई प्रतियोगी परीक्षाएँ पेपर लीक, नकल, तकनीकी गड़बड़ियों और भर्ती में देरी के आरोपों से घिरी रही हैं। इससे युवाओं में यह भावना गहरी हुई है कि उनकी वर्षों की मेहनत कुछ लोगों की बेईमानी की भेंट चढ़ सकती है। यही अविश्वास आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक है। असामान्य तब होता है जब सरकार और जनता के बीच संवाद समाप्त हो जाए। यदि छात्रों की प्रारंभिक शिकायतों पर गंभीरता से चर्चा होती, पारदर्शी जांच की प्रक्रिया शुरू होती और भरोसा कायम किया जाता, तो शायद हालात संसद मार्च तक नहीं पहुँचते।
यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी लोकतंत्र में हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, पुलिस पर हमला करना या कानून हाथ में लेना किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। वहीं शांतिपूर्ण विरोध को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर दबाने का प्रयास भी लोकतांत्रिक समाधान नहीं कहा जा सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि सत्ता आलोचना को सुनने और उसका उत्तर देने का कितना साहस रखती है।
सोनम वांगचुक का आंदोलन भी इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा बना। उनके अनशन ने परीक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और जवाबदेही जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया। अंततः सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत तथा सुधारों के आश्वासनों ने यही संकेत दिया कि स्थायी समाधान संवाद की मेज पर ही मिलते हैं।
पेपर लीक अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। जब प्रश्नपत्र करोड़ों रुपये में बिकने लगें और लाखों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लग जाए, तब यह केवल परीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतिभा के साथ विश्वासघात बन जाता है।
सरकार ने पेपर लीक रोकने के लिए कानूनों को कठोर बनाया है, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं होंगे। निष्पक्ष जांच, त्वरित अभियोजन और दोषियों को समयबद्ध दंड ही व्यवस्था में विश्वास बहाल कर सकते हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों ने डिजिटल सुरक्षा, बहु-स्तरीय एन्क्रिप्शन और सख्त निगरानी व्यवस्था के माध्यम से परीक्षा सुरक्षा का मजबूत मॉडल विकसित किया है। भारत भी तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बल पर ऐसी व्यवस्था बना सकता है।
यह भी समझना होगा कि बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं पर गहरा मानसिक प्रभाव डालते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो असंतोष स्वाभाविक है। इसलिए परीक्षा सुधार केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकता भी है।
राजनीतिक दलों को भी इस विषय पर संयम बरतना चाहिए। छात्रों की पीड़ा को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय समाधान तलाशना समय की मांग है। विपक्ष का दायित्व रचनात्मक सुझाव देना है, जबकि सरकार की जिम्मेदारी पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता सुनिश्चित करना है।
आज आवश्यकता ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित करने की है जिसमें प्रतिभा जीते, ईमानदारी जीते और हर युवा यह महसूस करे कि उसकी मेहनत सुरक्षित है। राष्ट्रीय परीक्षा संस्थाओं को अधिक स्वतंत्र, तकनीकी रूप से सक्षम और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल ऑडिट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, समयबद्ध जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई जैसे उपायों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
भारत का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में है। यदि उनका विश्वास संस्थाओं से डगमगा गया तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति बैरिकेडिंग में नहीं, बल्कि विश्वास के पुल बनाने में है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहना चाहिए। यही भरोसा न्याय, पारदर्शिता और निरंतर संवाद से अर्जित होता है।
(लेखक विश्लेषक, विचारक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

