हिन्दुस्तान वार्ता।✍️ डॉ.प्रमोद कुमार
भारतवर्ष एक बहुवादी सांस्कृतिक, सामाजिक, व भौगोलिक विविधिताओं वाला राष्ट्र है जिसमें विभिन्न प्रकार के अलग अलग रूप देखने को मिलते है लेकिन इसकी यही विविधता को एक खूबसूरती में बदलने का श्रेय जाता है भारत के लौह पुरुष सरदार बल्भव भाई पटेल जी को जिन्होंने इसकी विविधता को एकता के स्वरूप में बदल डाला था। लेकिन कालांतर से वर्तमान परिप्रक्ष्य में इसी विविधता में एकता को बनाए रखने के लिए उनके विचार और आदर्श प्रासंगिक होते हैं। भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता केवल भौगोलिक सीमाओं अथवा राजनीतिक सत्ता की निरंतरता का विषय नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक चेतना, सामाजिक सहअस्तित्व, सांस्कृतिक बहुलता, संवैधानिक प्रतिबद्धता और नागरिक उत्तरदायित्व से निर्मित एक व्यापक राष्ट्रीय अवधारणा है। भारत जैसे बहुभाषायी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश में राष्ट्रीय एकता का अर्थ विविधताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें समान सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर एक साझा राष्ट्रीय पहचान से जोड़ना है। भारतीय राष्ट्र की विशिष्टता इसी तथ्य में निहित है कि यहाँ विभिन्न भाषाओं, धार्मिक मान्यताओं, जीवन-पद्धतियों, क्षेत्रीय परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं के बावजूद सामूहिक राष्ट्रीय अस्तित्व की भावना विकसित हुई है। इसलिए राष्ट्रीय अखंडता को केवल राजनीतिक या प्रशासनिक एकीकरण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके लिए सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसरों की समानता, सांस्कृतिक सम्मान और लोकतांत्रिक सहभागिता भी अनिवार्य हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के सामने राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती अत्यंत जटिल थी। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के साथ देश को विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक तनाव, विस्थापन, प्रशासनिक अनिश्चितता और देशी रियासतों के भविष्य जैसे गंभीर प्रश्नों का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश भारत के प्रांतों के अतिरिक्त देश में अनेक देशी रियासतें थीं, जिनका भारतीय संघ में एकीकरण स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण की अनिवार्य शर्त था। उस समय भारत की राजनीतिक एकता स्वतः सुनिश्चित नहीं थी। विभिन्न रियासतों की राजनीतिक स्थिति, शासकों के हित, भौगोलिक परिस्थितियाँ और बाहरी प्रभाव राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को जटिल बना रहे थे। ऐसी ऐतिहासिक परिस्थिति में सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री के रूप में रियासतों के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रशासनिक दूरदर्शिता, राजनीतिक संवाद, व्यावहारिक कूटनीति और आवश्यक परिस्थितियों में दृढ़ निर्णय के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इस कार्य में तत्कालीन रियासत विभाग के सचिव वी. पी. मेनन तथा अन्य प्रशासकों और राजनीतिक नेतृत्व का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। अतः भारतीय एकीकरण को किसी एक व्यक्ति का कार्य मानने के बजाय सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास और ऐतिहासिक नेतृत्व की उपलब्धि के रूप में समझना अधिक तथ्यपरक होगा।
सरदार पटेल के योगदान का ऐतिहासिक महत्त्व इस बात में निहित है कि उन्होंने स्वतंत्रता के तत्काल बाद राजनीतिक विखंडन की संभावनाओं के बीच एक संगठित भारतीय संघ की स्थापना को प्राथमिकता दी। जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर जैसी रियासतों से जुड़े प्रश्नों ने राष्ट्रीय एकीकरण की जटिलता को स्पष्ट किया। इन मामलों में राजनीतिक परिस्थितियाँ, जनभावनाएँ, भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा संबंधी प्रश्न अलग-अलग थे। इसलिए इनके समाधान की प्रक्रियाएँ भी एक जैसी नहीं रहीं। हैदराबाद के संदर्भ में सितंबर 1948 की पुलिस कार्रवाई, जूनागढ़ में जनमत-संग्रह तथा जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की विशिष्ट परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में राजनीतिक संवाद, कानूनी प्रक्रियाओं, प्रशासनिक निर्णयों और सुरक्षा संबंधी विचारों की अलग-अलग भूमिका रही। इन घटनाओं का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। पटेल की भूमिका का वास्तविक मूल्यांकन उनके योगदान को स्वीकार करने के साथ-साथ उस व्यापक संस्थागत और सामूहिक प्रक्रिया को समझने में है, जिसने आधुनिक भारतीय संघ की नींव रखी।
स्वतंत्र भारत के निर्माण में पटेल की भूमिका केवल रियासतों के राजनीतिक विलय तक सीमित नहीं थी। उन्होंने राष्ट्रीय प्रशासन की स्थिरता और अखिल भारतीय सेवाओं की भूमिका को भी महत्त्व दिया। उनका मानना था कि एक विशाल और विविधतापूर्ण देश के सुचारु संचालन के लिए ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था आवश्यक है, जो राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ निष्पक्षता, अनुशासन और संस्थागत उत्तरदायित्व का निर्वहन कर सके। भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा जैसी अखिल भारतीय संस्थाओं की निरंतरता के पक्ष में उनका दृष्टिकोण इसी व्यापक सोच का परिचायक था। राष्ट्रीय एकता के लिए राजनीतिक सीमाओं का एकीकरण जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक प्रशासनिक समन्वय, कानून का शासन और नागरिकों के प्रति राज्य की समान उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका भी है। इस दृष्टि से पटेल का योगदान आधुनिक भारतीय प्रशासनिक संरचना के विकास से भी जुड़ा हुआ है।
वर्तमान भारत में राष्ट्रीय अखंडता का स्वरूप स्वतंत्रता के समय की चुनौतियों से भिन्न है, लेकिन इसकी मूल आवश्यकता आज भी बनी हुई है। उस समय प्रश्न रियासतों के राजनीतिक विलय और एक संप्रभु राष्ट्र की स्थापना का था, जबकि आज चुनौती एकीकृत राष्ट्र के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक विश्वास, क्षेत्रीय संतुलन और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाए रखने की है। भारतीय संविधान इस दिशा में व्यापक आधार प्रदान करता है। संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को राष्ट्रीय जीवन के मूल आदर्शों के रूप में स्थापित करती है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के निषेध और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का आधार प्रदान करते हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 19 नागरिक स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है। इन प्रावधानों का व्यापक उद्देश्य ऐसा लोकतांत्रिक समाज निर्मित करना है, जिसमें राष्ट्रीय एकता नागरिक स्वतंत्रताओं और समान अधिकारों के साथ विकसित हो।
समकालीन भारत में राष्ट्रीय एकता के समक्ष प्रमुख चुनौती सामाजिक विषमता और सामाजिक विभाजन की है। जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, आर्थिक असमानता, लैंगिक विषमता तथा सामाजिक अवसरों का असंतुलित वितरण राष्ट्रीय एकात्मता की भावना को प्रभावित करते हैं। किसी भी राष्ट्र की एकता केवल इस आधार पर सुनिश्चित नहीं हो सकती कि उसके नागरिक एक ही राजनीतिक भूभाग में निवास करते हैं। वास्तविक एकता तब विकसित होती है, जब प्रत्येक नागरिक को सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और विकास के अवसरों तक न्यायसंगत पहुँच प्राप्त हो। सामाजिक न्याय के बिना राष्ट्रीय एकता का विचार अधूरा रहता है। इसलिए वंचित समुदायों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की भागीदारी को राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य शर्त के रूप में देखना चाहिए। राष्ट्रीय एकता का उद्देश्य सामाजिक असमानताओं को छिपाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक उपायों से उनका समाधान करना होना चाहिए।
धार्मिक एवं सामुदायिक विविधता भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण आधार है। विभिन्न धार्मिक परंपराओं और समुदायों ने भारतीय सभ्यता के विकास में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है। किंतु जब धार्मिक पहचान को पारस्परिक सम्मान के स्थान पर अविश्वास, पूर्वाग्रह अथवा संघर्ष का आधार बनाया जाता है, तब सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है। सांप्रदायिक तनाव, घृणात्मक अभिव्यक्तियाँ, अफवाहें और सामुदायिक रूढ़ियाँ नागरिकों के बीच दूरी बढ़ा सकती हैं। इस संदर्भ में राष्ट्रीय एकता का अर्थ किसी एक धार्मिक, भाषायी या सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान का पर्याय बनाना नहीं है। भारतीय राष्ट्र की एकता का आधार संविधान द्वारा सुनिश्चित समान नागरिकता, धार्मिक स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और पारस्परिक सम्मान होना चाहिए। किसी भी समुदाय के प्रति सामूहिक दोषारोपण अथवा भेदभाव की प्रवृत्ति राष्ट्रीय एकात्मता के अनुकूल नहीं हो सकती।
भारत की भौगोलिक अखंडता का प्रश्न भी वर्तमान परिस्थितियों में बहुआयामी हो गया है। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास, आतंकवाद, घुसपैठ, साइबर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियाँ राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। इसके साथ ही देश के भीतर क्षेत्रीय असंतुलन, संसाधनों का असमान वितरण, रोजगार के अवसरों की कमी और विकास संबंधी विषमताएँ भी राष्ट्रीय एकीकरण को प्रभावित कर सकती हैं। सीमावर्ती एवं दूरस्थ क्षेत्रों में आधारभूत संरचना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, संचार और रोजगार का विस्तार केवल विकास कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के उपाय भी हैं। यदि किसी क्षेत्र के नागरिक स्वयं को विकास की मुख्यधारा से अलग अनुभव करते हैं, तो उनके भीतर क्षेत्रीय उपेक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। इसलिए राष्ट्रीय अखंडता की दृष्टि से विकास का भौगोलिक संतुलन और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं।
भाषायी और सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में भी राष्ट्रीय एकता की अवधारणा को व्यापक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। भारत में भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों की ऐतिहासिक स्मृति, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की वाहक हैं। भाषायी विविधता को राष्ट्रीय एकता के लिए बाधा मानना उचित नहीं होगा। इसके विपरीत, सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और पारस्परिक संवाद से राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना अधिक समृद्ध हो सकती है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के विकास के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं और आदिवासी भाषायी परंपराओं का संरक्षण भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता किसी एक भाषा के प्रभुत्व से नहीं, बल्कि भाषाओं के बीच सम्मानपूर्ण सहअस्तित्व और संवाद से सुदृढ़ होती है। इसी प्रकार क्षेत्रीय त्योहारों, लोककलाओं, साहित्य, संगीत, नृत्य और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत के साझा अंग के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है।
वर्तमान समय में डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया ने राष्ट्रीय एकता के प्रश्न को नया आयाम प्रदान किया है। सूचना का तीव्र प्रसार जनभागीदारी और लोकतांत्रिक संवाद के लिए उपयोगी है, लेकिन अप्रमाणित सूचनाएँ, भ्रामक समाचार, कृत्रिम रूप से निर्मित दृश्य-श्रव्य सामग्री और ऑनलाइन घृणात्मक प्रचार सामाजिक विश्वास को कमजोर कर सकते हैं। डिजिटल मंचों पर प्रसारित संवेदनशील सूचनाओं को बिना सत्यापन स्वीकार करना अथवा साझा करना सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है। अतः डिजिटल साक्षरता, तथ्य-जाँच, जिम्मेदार अभिव्यक्ति और मीडिया की नैतिक जवाबदेही को राष्ट्रीय एकता के आधुनिक उपकरणों के रूप में विकसित करना आवश्यक है। शिक्षण संस्थानों की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक चेतना और विविधता के प्रति सम्मान विकसित करके उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाया जा सकता है।
राष्ट्रीय एकता के समक्ष एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संघीय व्यवस्था के बीच संतुलन का है। भारत का संघीय ढाँचा राज्यों की भाषायी, सांस्कृतिक, भौगोलिक और प्रशासनिक विशिष्टताओं को मान्यता देता है। राज्यों की स्वायत्तता, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियों का निर्माण और केंद्र तथा राज्यों के बीच सहयोग लोकतांत्रिक शासन की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। संघीय व्यवस्था में मतभेदों का होना स्वाभाविक है; उन्हें राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध मानने के बजाय संवैधानिक संवाद और संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से सुलझाना चाहिए। सहकारी संघवाद का वास्तविक अर्थ यही है कि केंद्र और राज्य साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करें। क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं, बशर्ते दोनों के बीच संवैधानिक मर्यादा, पारस्परिक सम्मान और लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे।
इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में सरदार वल्लभभाई पटेल के ऐतिहासिक योगदान की वर्तमान प्रासंगिकता को समझा जा सकता है। उनके समय में राष्ट्रीय एकीकरण का प्रमुख माध्यम राजनीतिक संवाद, कूटनीति, प्रशासनिक निर्णय और परिस्थितियों के अनुरूप दृढ़ता थी। आज राष्ट्रीय एकता के संरक्षण के लिए लोकतांत्रिक सहभागिता, सामाजिक न्याय, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, निष्पक्ष प्रशासन, शिक्षा, आर्थिक समावेशन और संवाद की संस्कृति अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। पटेल की ऐतिहासिक भूमिका से यह सीख मिलती है कि राष्ट्रहित के प्रश्नों पर व्यापक दृष्टिकोण, व्यावहारिक निर्णय क्षमता और सामूहिक उत्तरदायित्व आवश्यक हैं। हालांकि उनके समय की प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों को वर्तमान लोकतांत्रिक संदर्भ पर यथावत लागू नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के योगदान से प्रेरणा ग्रहण करने का अर्थ उनके प्रत्येक निर्णय को वर्तमान परिस्थितियों के लिए आदर्श मान लेना नहीं, बल्कि उनके कार्यों का ऐतिहासिक संदर्भ में विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना है।
राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में शिक्षा और युवा पीढ़ी की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राष्ट्रीय एकता केवल सरकारी नीतियों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं अथवा सुरक्षा तंत्र के माध्यम से स्थायी नहीं बनाई जा सकती; इसके लिए नागरिकों में लोकतांत्रिक चेतना, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी आवश्यक है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान, सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा देश की सांस्कृतिक विविधता का संतुलित अध्ययन विद्यार्थियों को राष्ट्र की व्यापक अवधारणा से जोड़ सकता है। राष्ट्रीय एकता का अर्थ केवल राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का सम्मान करना, कर्तव्यों का निर्वहन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना भी है। युवाओं को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय संवेदना और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति अपनाने के लिए प्रेरित करना समय की आवश्यकता है।
सरदार पटेल की ऐतिहासिक विरासत का राष्ट्रहित में सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक विखंडन की संभावनाओं के बीच एक संगठित राष्ट्र की स्थापना को प्राथमिकता दी। उनके योगदान को स्मरण करना केवल किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का सम्मान करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की उस प्रक्रिया को समझना है, जिसमें राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासनिक दक्षता, संस्थागत सहयोग और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की निर्णायक भूमिका रही। उनके जीवन और कार्यों का अध्ययन हमें यह समझने का अवसर देता है कि राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत, क्षेत्रीय और संकीर्ण राजनीतिक हितों से व्यापक होता है। साथ ही, राष्ट्रहित की व्याख्या संविधान, लोकतांत्रिक मर्यादाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और सामाजिक न्याय के अनुरूप होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता तभी सार्थक है, जब उसमें प्रत्येक नागरिक की गरिमा और प्रत्येक क्षेत्र की वैध आकांक्षाओं के लिए पर्याप्त स्थान हो।
वस्तुतः एकीकृत भारत की परिकल्पना एक निरंतर विकसित होने वाली राष्ट्रीय परियोजना है। स्वतंत्रता के समय राजनीतिक एकीकरण इसकी प्राथमिक आवश्यकता थी, जबकि वर्तमान समय में सामाजिक विश्वास, आर्थिक न्याय, सांस्कृतिक सहअस्तित्व, क्षेत्रीय संतुलन और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती इसके प्रमुख आधार हैं। आज भारत के समक्ष चुनौती केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि उन सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक परिस्थितियों को भी सुदृढ़ करना है, जो नागरिकों को राष्ट्र के साथ भावनात्मक एवं संवैधानिक रूप से जोड़ती हैं। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी, निष्पक्ष प्रशासन, समावेशी विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा संवाद आधारित सामाजिक वातावरण आवश्यक है।
अंततः राष्ट्रीय अखंडता किसी एक विचारधारा, समुदाय, भाषा, क्षेत्र अथवा राजनीतिक नेतृत्व की उपलब्धि नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है। सरदार वल्लभभाई पटेल का ऐतिहासिक योगदान इस सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आधारशिला है। उनके योगदान की समकालीन प्रासंगिकता इसी में है कि भारत अपनी राजनीतिक एकता को सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक बहुलता, आर्थिक समानता और संवैधानिक प्रतिबद्धता के साथ निरंतर मजबूत करे। राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी भौगोलिक विशालता या संसाधनों की प्रचुरता मात्र में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के पारस्परिक विश्वास, समान अधिकारों, साझा उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित होती है। इसलिए एकीकृत भारत की संकल्पना को सार्थक बनाने का मार्ग विविधताओं का सम्मान करते हुए समान अवसरों, न्यायपूर्ण विकास और राष्ट्रीय सहभागिता को सुनिश्चित करने से होकर गुजरता है। यही राष्ट्रीय अखंडता का व्यावहारिक स्वरूप और राष्ट्रहित की व्यापक अवधारणा है। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता सामाजिक , सांस्कृतिक व भौगोलिक रूप से मजबूत होगी तभी हम विकसित भारत की कल्पना को साकार कर सकते है। विकसित भारत ही राष्ट्रीय एकता और अखंडता का प्रतीक स्थापित होगा।
लेखक - डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा।

