सबसे पहले इन किताबों को उस काटन में आहिस्ता से लगाओ,देखो कोई फटे नहीं, खराब न हो...!
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। "जो कभी परचुरे का स्टोर रूम हुआ करता था, उसकी छत पर एक बड़ा सा झंडा लहरा रहा था। परचुरे जी ने लेबर को बुलाकर कहा- ‘ये सामान रखना शुरू करो। सबसे पहले इन किताबों को उस काटन में आहिस्ता से लगाओ, देखो कोई फटे नहीं, खराब न हो...!" यह अंश है डॉक्टर हर्ष देव की कहानी 'परोपकार' का, जिसका पाठ आज यहां "किस्सा कहानी-३" कार्यक्रम में किया गया। उक्त कार्यक्रम रंगलीला और कथादेश ने संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया था।
कार्यक्रम का आयोजन शिरोज़ हैंगआउट ने किया, आतिथ्य नागरी प्रचारिणी सभा का रहा। यह कहानी अपने विभिन्न पात्रों और घटनाक्रमों के माध्यम से धर्म के बाजारीकरण को मुखर करती है। कई सवाल खड़े करती है। उल्लेखनीय है यह कहानी कोलकाता से प्रकाशित 'वागर्थ' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विभांशु दिव्याल ने कहा कि सनातन तो सार्वभौम भ्रातत्व का भाव पैदा कार्य है। लेकिन आज उसको ही गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। कहानी में कथाकार दिखाता है कि किस तरह धर्म के नाम पर पाखंड बढ़ रहा है। धर्म और मजहब आज राजनीतिक और आर्थिक शक्ति प्राप्त करने का साधन बनता जा रहा है। धर्म के नाम पर जिनको सत्ता लेनी थी, उनको आज वो मिल गई है, लेकिन अब आम आदमी के हाथों से सब कुछ छीना जा रहा है।
साहित्यकार अरुण डंग ने कहा किस्सा कहानी दो भाषाओं और संस्कृतियों का मिलन है। किस्सा अरबी शब्द है और कहानी संस्कृत के कथा से निकला हिंदी का शब्द है। हर्षदेव जी की कहानी पढ़ी गई है, लेकिन वो हमारे बीच नहीं, हर्षदेव जी को याद करते कहा, उनका जुड़ाव भले किसी विचारधारा से रहा हो, लेकिन जिस्म और रूह सदैव पत्रकारिता से ही जुड़े रहे। उन्होंने कहा कहानी में दिखाया है भगवान तो कहीं और चले गए, लोग खुद भगवान होने का प्रयास करने लगे,उद्देश्य से ही भटक गए।
कथाकार शक्ति प्रकाश ने डॉक्टर हर्ष देव जी की कहानी का वाचन किया। कहानी वाचन बाद उसकी समीक्षा करते हुए कहा, इस कहानी में धर्म के नाम पर पाखंड को भी दिखाया गया है।
प्रो.रामवीर सिंह ने कहा कहानी के अंदर संप्रेषण दिखाई दिया। उन्होंने कहा धर्म होता तो शांति के लिए है, लेकिन जब गलत हाथों में चला जाए, तो यह अशांति का कारण भी बन जाता है।
प्रो.ज्योत्सना रघुवंशी ने कहा आजकल अखबार खोलें, धार्मिक खबरों से भरे पड़े दिखते हैं। कहानी सोचने को मजबूर करती है कि आज बढ़ती हुई धर्मांधता पर भी हम चिंतन करें। डॉ. राम गोपाल सिंह चौहान साहब आगरा कॉलेज में जब पढ़ाते थे तो कहते थे, कहानी हमेशा रेस के घोड़े की तरह होती है, जिसमें यह लगना चाहिए़ कि अब क्या होगा? डॉक्टर हर्ष देव जी की यह कहानी भी उत्सुकता अंत तक बनाए रखने में सफल रही है।
प्रो.कमलेश नागर ने कहा कहानी सुनते समय मेरा मन आगरा में घूम रहा था। मुझे यह कहानी सुनने के बाद महसूस हुआ कि किस तरह से आज धर्म भी एक रोजगार का साधन बन चुका है। आज शहर में चारों तरफ तमाम मंदिर एवं मज़ार दिखाई देती हैं। शलभ भारती ने कहा कि यह कहानी अपने पात्रों के माध्यम से आज के समाज के लोगों की मनोवृत्तियों को व्यक्त करती है।
डॉ. मधु भारद्वाज ने कहा पहले परिचर्चाओं का समृद्ध दौर हुआ करता था। 'रंगलीला' और 'कथादेश' उसी दौर को लौटा रही है। कहानी सुनकर लगा संवेदनशील व्यक्ति चालबाज लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाता है। धर्म अब दिखावे की बात रह गई है। सीमांत साहू ने कहा कि कहानी के कई चरित्र यह बयां करते हैं कि धर्म का बाजारीकरण हो चुका है, कर्मकांड ने इसे बढ़ाया है।
श्रीकृष्ण ने कहा कहानी सुनने के बाद लगा कि यह आज के समाज की कड़वी सच्चाई कहती है, धर्म नितांत अंतर्मन का विषय है, बाहर निकलने लगता है तो नुकसान ही पहुंचाता है।
वरिष्ठ कवि रामेंद्र मोहन त्रिपाठी ने कहा कि यह कहानी सुनकर लगा हर्षदेव जी ने अंत पहले सोचा, और कहानी बाद में लिखी।वहीं राजीव शर्मा ने भी इस कहानी को लेकर अपने विचार रखे।
'कथादेश' पत्रिका के संपादक हरि नारायण ने अध्यक्षता की। इस मौके पर सुमन हर्षदेव भी मौजूद थीं। कार्यक्रम के संयोजक और रंगलीला के निर्देशक अनिल शुक्ल ने स्वागत भाषण दिया। मुख्य अतिथि का स्वागत मनोज सिंह ने किया। मंच संचालन कवि रमेश पंडित ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. महेश चंद्र धाकड़ ने किया। कार्यक्रम में विशेष सहयोग अजय तोमर, शिव नारायण शिबू और मनीषा शुक्ला का रहा। कार्यक्रम में प्रो.आभा चतुर्वेदी, सुनयन शर्मा, राकेश निर्मल, शरद गुप्ता, अनिल शर्मा, असलम सलीमी, हिमानी चतुर्वेदी, मन्नू शर्मा, आर्निका माहेश्वरी, अनिल दीक्षित, अरविंद गुप्ता, टोनी फास्टर आदि भी मौजूद थे।
रिपोर्ट - असलम सलीमी



