संत गाडगे महाराज : अंधविश्वास उन्मूलन से समतामूलक समाज निर्माण के लोकनायक व अग्रदूत

 


                                            


                                                                            

                                                                                                                                           

 हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ डॉ.प्रमोद कुमार

भारतीय समाज के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपने जीवन को ही संदेश बना दिया। संत गाडगे महाराज ऐसे ही लोकनायक थे, जिनका संपूर्ण जीवन अंधविश्वास,सामाजिक कुरीतियों, जातिगत ऊँच-नीच, अशिक्षा और अस्वच्छता के विरुद्ध एक सतत संघर्ष रहा। वे उन संतों में नहीं थे जो केवल आध्यात्मिक साधना में लीन रहे; वे समाज के बीच उतरकर उसकी वास्तविक समस्याओं से जूझने वाले कर्मयोगी संत थे। उनका व्यक्तित्व भारतीय संत परंपरा का विस्तार तो था ही, साथ ही वह आधुनिक सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का जीवंत उदाहरण भी था। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मानवीय आदर्शों को केवल विचार के स्तर पर नहीं रखा, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारकर जनमानस को जागृत किया।

संत गाडगे महाराज का जीवन अत्यंत साधारण परिस्थितियों में प्रारंभ हुआ। निर्धन परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने बाल्यावस्था से ही अभाव, असमानता और सामाजिक उपेक्षा का अनुभव किया। यह अनुभव ही उनके जीवन का मार्गदर्शक बना। उन्होंने देखा कि समाज में गरीबी केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि अज्ञान, अंधविश्वास और सामाजिक अन्याय के कारण भी है। लोग मंदिरों में दान तो देते हैं, परंतु अपने ही गांव की गंदगी और गरीबों की दयनीय स्थिति की ओर ध्यान नहीं देते। इसी विडंबना ने उनके भीतर एक क्रांतिकारी दृष्टि का विकास किया। उन्होंने निश्चय किया कि यदि समाज को बदलना है तो सबसे पहले उसकी मानसिकता बदलनी होगी।

उनकी कार्यशैली अत्यंत विशिष्ट थी। वे जिस भी गांव में प्रवेश करते, सबसे पहले वहां की सफाई का कार्य स्वयं आरंभ कर देते। हाथ में झाड़ू लेकर वे सड़कों, गलियों और मंदिरों के परिसर की सफाई करते। उनका यह आचरण ही लोगों के लिए संदेश बन जाता था कि स्वच्छता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी होनी चाहिए। वे कहते थे कि जिस समाज में गंदगी है, वहां ईश्वर का वास कैसे हो सकता है। उनके लिए स्वच्छता केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं थी; वह सामाजिक आत्मसम्मान और सभ्यता का प्रतीक थी। आज जब स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान के रूप में देखा जाता है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि संत गाडगे महाराज ने दशकों पहले ही इसे जनचेतना का विषय बना दिया था।

अंधविश्वास के विरुद्ध उनका संघर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने देखा कि समाज में अनेक प्रकार के कर्मकांड, चमत्कारों की कथाएँ और भय पर आधारित धार्मिक प्रथाएँ प्रचलित थीं, जिनसे गरीब और अशिक्षित लोग शोषित होते थे। वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि ईश्वर पत्थर की मूर्तियों में नहीं, बल्कि भूखे और पीड़ित मनुष्यों में बसता है। उन्होंने लोगों को समझाया कि दान-पुण्य का वास्तविक अर्थ मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता करना है। वे धार्मिक आडंबरों और पाखंड का खुला विरोध करते थे। उनकी वाणी में करुणा थी, परंतु साथ ही साहस भी था। वे जनसमूह के सामने खड़े होकर निर्भीकता से सामाजिक बुराइयों की आलोचना करते और लोगों को विवेक का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते।

संत गाडगे महाराज का सामाजिक दृष्टिकोण समानता पर आधारित था। वे जाति-व्यवस्था और छुआछूत को मानवता के विरुद्ध मानते थे। उनके प्रवचनों में बार-बार यह बात उभरकर आती थी कि सभी मनुष्य समान हैं और किसी भी प्रकार की ऊँच-नीच ईश्वर की इच्छा नहीं, बल्कि मनुष्य की बनाई हुई व्यवस्था है। उन्होंने दलितों और वंचितों के साथ बैठकर भोजन किया, उनके घरों में गए और उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीने की प्रेरणा दी। उनके लिए धर्म का अर्थ था—मानवता की सेवा और सभी के साथ समान व्यवहार। इस दृष्टि से वे आधुनिक भारत के समतामूलक समाज के अग्रदूत माने जा सकते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने समझा कि जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक अंधविश्वास और शोषण समाप्त नहीं हो सकते। इसलिए उन्होंने अनेक छात्रावास, धर्मशालाएँ और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में योगदान दिया। वे भिक्षा में प्राप्त धन को व्यक्तिगत उपयोग में न लेकर समाजसेवा के लिए समर्पित कर देते थे। उनका विश्वास था कि शिक्षा केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि विवेक और नैतिकता का विकास है। वे बच्चों और युवाओं को प्रेरित करते थे कि वे शिक्षा प्राप्त कर समाज की बेड़ियों को तोड़ें और आत्मनिर्भर बनें।

स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व जैसे आदर्श उनके चिंतन के मूल में थे। यद्यपि ये मूल्य आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार माने जाते हैं, संत गाडगे महाराज ने इन्हें ग्रामीण और सामान्य जनजीवन में उतारने का प्रयास किया। वे लोगों को बताते थे कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी होनी चाहिए। जब तक मनुष्य अंधविश्वास और भय से मुक्त नहीं होगा, तब तक वह वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकता। समानता उनके लिए केवल नारा नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन का सिद्धांत था। वे सभी वर्गों के लोगों को एक साथ बैठकर कीर्तन और प्रवचन में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे। बंधुत्व की भावना को वे समाज की एकता का आधार मानते थे।

उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनते, भूमि पर सोते और न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीवन व्यतीत करते। यह सादगी ही उनकी नैतिक शक्ति थी। जब वे लोगों को त्याग और सेवा का संदेश देते, तो वह उपदेश नहीं, बल्कि उनके जीवन का अनुभव होता था। उन्होंने कभी व्यक्तिगत संपत्ति या प्रतिष्ठा की आकांक्षा नहीं की। जो कुछ भी प्राप्त हुआ, उसे समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इस प्रकार वे लोकनायक बने—ऐसे नायक जिन्हें जनता ने अपने आचरण और सेवा के आधार पर स्वीकार किया।

उनकी कार्यपद्धति में जनसंपर्क और संवाद की विशेष भूमिका थी। वे कीर्तन के माध्यम से लोगों को संदेश देते। लोकभाषा में, सरल शब्दों में वे गहरी सामाजिक बात कह देते थे। उनकी शैली में व्यंग्य भी होता था, जिससे लोग अपनी गलतियों पर हँसते हुए विचार कर सकें। वे किसी पर आक्रमण नहीं करते थे, परंतु कुरीतियों पर तीखा प्रहार अवश्य करते थे। यही कारण था कि उनके विचार दूर-दूर तक फैले और समाज के विभिन्न वर्गों ने उन्हें अपनाया।

संत गाडगे महाराज का योगदान केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। उनके विचारों की गूंज पूरे देश में सुनाई दी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि जनचेतना जागृत करने से संभव है। वे मानते थे कि यदि व्यक्ति स्वयं बदल जाएगा तो समाज स्वतः बदल जाएगा। इसलिए उन्होंने व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन पर बल दिया। स्वच्छता, सत्य, करुणा और सेवा—ये उनके जीवन के मूल मंत्र थे।

समतामूलक समाज की उनकी परिकल्पना आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान समय में जब विज्ञान और तकनीक ने अत्यधिक प्रगति कर ली है, तब भी अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे समय में संत गाडगे महाराज की शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि वास्तविक प्रगति केवल भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी होनी चाहिए। उन्होंने जो आंदोलन प्रारंभ किया था, वह केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहा; वह एक सतत प्रक्रिया बन गया। उनकी विरासत विभिन्न संस्थानों और अभियानों के माध्यम से आज भी जीवित है। अनेक विश्वविद्यालय, विद्यालय और सामाजिक संस्थाएँ उनके नाम से संचालित हैं। ग्रामीण स्वच्छता और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनके आदर्शों को अपनाया जा रहा है। परंतु सबसे बड़ी विरासत वह चेतना है जो उन्होंने जनमानस में जगाई—विवेक, आत्मसम्मान और सेवा की चेतना।

संत गाडगे महाराज का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा धर्म मानव सेवा है और सच्ची भक्ति समाज सुधार में निहित है। उन्होंने अंधविश्वास के विरुद्ध संघर्ष करते हुए यह दिखाया कि परिवर्तन के लिए साहस, समर्पण और निरंतरता आवश्यक है। वे केवल संत नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि यदि एक व्यक्ति भी दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े, तो वह पूरे समाज को दिशा दे सकता है। उनका व्यक्तित्व भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रारंभिक स्वरूप प्रतीत होता है। उन्होंने बिना किसी राजनीतिक पद या सत्ता के, केवल नैतिक बल के आधार पर समाज को प्रभावित किया। यही कारण है कि उन्हें लोकनायक कहा जाता है। उन्होंने जनसाधारण के बीच रहकर, उनकी भाषा में, उनकी समस्याओं को समझते हुए समाधान प्रस्तुत किए। उनका जीवन एक सतत संदेश है कि सामाजिक परिवर्तन का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु असंभव नहीं।

अंततः संत गाडगे महाराज का योगदान भारतीय समाज के इतिहास में एक उज्ज्वल अध्याय है। अंधविश्वास उन्मूलन से लेकर समतामूलक समाज निर्माण तक की उनकी यात्रा हमें यह प्रेरणा देती है कि विवेक,शिक्षा,स्वच्छता और मानवता के आधार पर ही सच्चे अर्थों में प्रगति संभव है। वे ऐसे लोकनायक थे जिन्होंने समाज को आत्मनिरीक्षण का अवसर दिया और उसे एक नई दिशा प्रदान की। उनके आदर्श आज भी हमारे लिए पथप्रदर्शक हैं और रहेंगे, जब तक हम एक न्यायपूर्ण,समतामूलक और स्वच्छ समाज के निर्माण का स्वप्न देखते 

लेखक-डिप्टी नोडल अधिकारी,MyGov

डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा