शिक्षा और समाज सुधार में उनके योगदान को किया याद
बज़्म-ए-मैकश के तत्वावधान में हुआ आयोजन,छात्राओं ने शोधपत्र प्रस्तुत कर सर सैयद के कार्यों पर डाला प्रकाश
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा, 17 अक्टूबर। आगरा नगर की साहित्यिक संस्था बज़्म-ए-मैकश के तत्वावधान में महान शिक्षाविद् एवं समाज सुधारक सर सैयद अहमद खाँ के जन्मदिवस के अवसर पर अल्लामा मैकश अकबराबादी के आस्ताने पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में वक्ताओं ने सर सैयद अहमद खाँ के शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक, कानूनी और पत्रकारिता के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों पर प्रकाश डालते हुए उनके विचारों को वर्तमान समय में भी प्रासंगिक बताया।
कार्यक्रम का आरंभ प्रो. नसरीन बेगम के व्याख्यान से हुआ। उन्होंने 'इल्म की शमा रोशन करने वाले रहबर-ए-कौम सर सैयद अहमद खाँ' विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए और शिक्षा के क्षेत्र में सर सैयद के योगदान को रेखांकित किया।
इसके बाद सेंट जॉन्स कॉलेज की छात्राओं सादिया, सानिया, सारिया अल्वी, तंजीम, आलिया निगार और आयरिन ने सर सैयद अहमद खाँ के कानून, शिक्षा, सियासत, सामाजिक सुधार और पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने उनके कार्यों और विचारधारा के माध्यम से समाज में शिक्षा एवं जागरूकता के प्रसार के महत्व को समझाया।
सेंट जॉन्स कॉलेज के उर्दू विभाग की बी.ए. एवं एम.ए. की छात्राओं अनम अयूब, मंतशा, इल्मा रफी और आलिमा ने सर सैयद अहमद खाँ के कार्यों एवं उनकी पुस्तकों पर आधारित शोधपत्र प्रस्तुत किए। छात्राओं ने अपने शोध के माध्यम से उनके साहित्यिक, शैक्षिक और सामाजिक योगदान को सामने रखा।
विशिष्ट अतिथि डॉ. मोहम्मद हुसैन ने अपने संबोधन में सर सैयद के तालीमी मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके द्वारा शुरू किए गए शैक्षिक प्रयासों और कार्यों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षा को समाज की तरक्की का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
सैयद फैज़ अली शाह ने कहा कि इल्म की दौलत से बढ़कर कोई दौलत नहीं है। आज समाज को सर सैयद अहमद खाँ के शैक्षिक कारनामों को याद रखने के साथ-साथ उनके विचारों पर अमल करने की जरूरत है।
इस अवसर पर शाहिद नदीम ने अपनी गजल के माध्यम से सर सैयद अहमद खाँ की शख्सियत के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया।
मुख्य अतिथि प्रो. ज्योत्सना रघुवंशी ने अपने संबोधन में कहा कि सर सैयद शिक्षा का बहुत व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। वह अपने मुल्क को सरबुलंद देखना चाहते थे। उनके विचारों में शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्र की उन्नति का विशेष महत्व था।
कार्यक्रम के दौरान अलीगढ़ का प्रसिद्ध तराना 'यह मेरा चमन है,मेरा चमन' भी प्रस्तुत किया गया,जिसने समारोह में विशेष प्रभाव उत्पन्न किया।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्था के संरक्षक सैयद अजमल अली शाह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि सर सैयद अहमद खाँ अलीगढ़ तहरीक के संस्थापक थे। उन्होंने साइंटिफिक सोसाइटी, इंस्टीट्यूट गजट और पत्रिका 'तहजीब-उल-अखलाक' के माध्यम से शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके प्रयासों ने समाज में आधुनिक शिक्षा और सुधारवादी विचारों को प्रोत्साहित किया।
अंत में सैयद फैज़ अली शाह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने अलीगढ़ के प्रसिद्ध तराने 'यह मेरा चमन है, मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं' का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके रचनाकार असरारुल हक मजाज हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मजाज, अल्लामा मैकश अकबराबादी के आस्ताने पर आते रहते थे।
सेमिनार के माध्यम से सर सैयद अहमद खाँ के शैक्षिक एवं सामाजिक योगदान को याद करते हुए उनके विचारों को अपनाने और शिक्षा के प्रसार के लिए निरंतर प्रयास करने का संदेश दिया गया।
रिपोर्ट : असलम सलीमी



