वेनेजुएला के बाद ग्रीन लैंड और कनाडा की बारी




हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ पूरन डावर 'चिंतक एवं विश्लेषक'

वेनजुएला के बाद अब ग्रीनलैंड को लेकर केवल सुगबुगाहट नहीं है, अमेरिका गंभीरता से तैयारी करता दिखाई दे रहा है। अमेरिका के ये प्रयास किसी एक-दो क्षेत्रों पर कब्ज़े तक सीमित नहीं हैं,बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन और संभावित बड़े संघर्षों की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं। विश्व आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ टकराव की आशंकाएँ लगातार गहरी होती जा रही हैं।

एक तरफ़ चीन आर्थिक,तकनीकी और सैन्य रूप से इतना सशक्त हो चुका है कि वह अमेरिका को उसी के प्रभाव-क्षेत्र में चुनौती देने लगा है। दूसरी ओर रूस भी अपने पुराने प्रभाव-क्षेत्र को फिर से संगठित करने का प्रयास कर रहा है। वेनेजुएला, यूक्रेन, दक्षिण चीन सागर और अब आर्कटिक—ये सभी उसी व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष के संकेत हैं।

2014 में रूस द्वारा यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र पर नियंत्रण के बाद यूक्रेन अपने अस्तित्व को लेकर आशंकित हुआ और नाटो की ओर झुका। विघटित सोवियत संघ के बाद यूक्रेन सामरिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण देशों में रहा है। कई विश्लेषक मानते हैं कि पुतिन यूक्रेन पर प्रभाव स्थापित कर रूस के खोए हुए प्रभाव-क्षेत्र को पुनः सुदृढ़ करना चाहते हैं। यूक्रेन के बाद कज़ाख़स्तान, ताजिकिस्तान, अज़रबैजान, आर्मेनिया, लातविया और एस्टोनिया जैसे छोटे देशों की सैन्य क्षमता सीमित है,जिससे उनकी सुरक्षा बड़े गठबंधनों पर निर्भर हो जाती है।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका चीन और रूस-दोनों को यह संदेश देना चाहता है कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में उसकी निर्णायक भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई है। साथ ही,वह भविष्य की सैन्य और सामरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है।

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है और आर्कटिक क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य-रणनीतिक स्थिति रखता है। डोनाल्ड ट्रम्प सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड केवल सैनिक तैनाती का विषय नहीं,बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा हितों से जुड़ा प्रश्न है। उनका तर्क है कि रूस या चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह आवश्यक है।

इस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी स्पष्ट रही है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने साफ कहा है कि वे अपनी भूमि किसी को नहीं देंगे। यूरोप और अमेरिका के कुछ नेताओं ने यह चेतावनी भी दी है कि ऐसे कदम नाटो और मित्र देशों के बीच भरोसे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

लेकिन इस पूरे प्रकरण को केवल वर्तमान घटनाओं के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अमेरिका के इतिहास और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि को समझना होगा। अमेरिका ने औपनिवेशिक शासन को जितना सहा और समझा है, उतना शायद ही किसी अन्य देश ने। उसकी स्वतंत्रता-घोषणा में यह भाव स्पष्ट है कि जब तक दुनिया में कहीं भी परतंत्रता है,स्वतंत्रता अधूरी है।

जब अमेरिका ने अपनी सैन्य शक्ति विकसित की,तब न तो रूस उसका शत्रु था और न ही चीन। द्वितीय विश्व युद्ध में रूस अमेरिका का सहयोगी रहा और चीन लंबे समय तक आंतरिक संघर्षों और बाहरी अधीनता से जूझता रहा। 1980 के बाद ही चीन वैश्विक मंच पर उभरा और उसमें अमेरिकी आर्थिक व तकनीकी सहयोग की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

ग्रीनलैंड लंबे समय तक डेनिश क्राउन की कॉलोनी रहा। 1953 में उसकी औपनिवेशिक स्थिति समाप्त हुई और वह डेनमार्क का अंग बना। 2009 में उसे स्वशासन मिला,अपनी संसद बनी, हालाँकि वह आज भी डेनमार्क के अंतर्गत है। वह अभी स्वतंत्र नहीं है, लेकिन स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का अधिकार रखता है।

उत्तरी अमेरिका में कनाडा ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश प्रभाव में रहा है और आज भी उसका संवैधानिक ढांचा ब्रिटेन से जुड़ा है। कई रणनीतिक विश्लेषक कनाडा को ब्रिटेन की एक प्रकार की रणनीतिक प्रॉक्सी के रूप में देखते हैं, विशेषकर आर्कटिक और अटलांटिक क्षेत्र में। यही कारण है कि अमेरिका की दीर्घकालिक दृष्टि में कनाडा केवल पड़ोसी देश नहीं,बल्कि सुरक्षा ढांचे का अहम हिस्सा है।

यदि यूरोप और नाटो देशों के साथ अमेरिका के संबंधों में तनाव बढ़ता है, तो यह भी संभव है कि अमेरिका ग्लोबल साउथ-एशिया,अफ्रीका,लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व में नए मित्र तलाशे। इन क्षेत्रों के कई देश न तो पूरी तरह चीन के खेमे में जाना चाहते हैं और न ही रूस के बल्कि संतुलित साझेदारी की तलाश में हैं।

ट्रम्प सही कर रहे हैं या गलत-यह भविष्य बताएगा। यह अवश्य स्पष्ट है कि वे सैन्य संघर्ष के स्थान पर टैरिफ जैसे आर्थिक हथियार को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन हर सामरिक आवश्यकता का समाधान टैरिफ नहीं हो सकता। ग्रीनलैंड इसका प्रमुख उदाहरण है।

आज यूरोप और नाटो देशों में ट्रम्प के प्रति असंतोष दिखाई देता है और मित्र देशों के साथ यह रास्ता अमेरिका के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। यदि ग्रीनलैंड की आवश्यकता सामूहिक सुरक्षा से जुड़ी है, तो मित्र देशों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना ही अधिक व्यावहारिक मार्ग होगा। यदि यही एकतरफ़ा और उद्दण्ड शैली जारी रही, तो विश्व फिर से अलग-अलग खेमों में बँट सकता है और तृतीय विश्व युद्ध में कौन किस ओर होगा, यह आज भविष्य के गर्त में है।

(ये लेख,लेखक का सोच और विश्लेषण है,वास्तविकता भविष्य के गर्त में है)