जैव विविधता पर खतरे का आरोप, राज्य सरकार की निष्क्रियता पर उठे
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा : आगरा स्थित सूर सरोवर पक्षी विहार (कीठम झील) और उससे सटे वन क्षेत्रों में तेजी से फैल रही विदेशी आक्रामक प्रजाति प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा (विलायती बबूल) को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है।
याचिकाकर्ता डॉ.देवाशीष भट्टाचार्य ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश सरकार अपने आधिकारिक दस्तावेजों में इस प्रजाति को जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा मान चुकी है, इसके बावजूद इसे हटाने और स्थानीय प्रजातियों के पुनर्स्थापन के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
याचिका के अनुसार, ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) के भीतर स्थित यह संवेदनशील पक्षी आवास विलायती बबूल के अनियंत्रित प्रसार से प्रभावित हो रहा है। यह प्रजाति गहरी जड़ों के जरिए भूजल का अत्यधिक दोहन करती है, जिससे जल स्तर गिरता है और अन्य वनस्पतियों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बनती हैं। साथ ही इसकी एलीलोपैथिक प्रकृति अन्य पौधों के बीजों के अंकुरण को बाधित कर जैव विविधता को तेजी से घटा रही है।
याचिका में राज्य सरकार के उस तर्क पर भी सवाल उठाया गया है, जिसमें TTZ क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह तर्क केवल औपचारिकता है, क्योंकि सरकार ने इस संबंध में अनुमति लेने की कोई पहल ही नहीं की। इसके विपरीत, वर्ष 2023 में मथुरा के ब्रज क्षेत्र में इसी प्रजाति को हटाने के लिए अदालत से अनुमति लेकर कार्रवाई की गई थी।
याचिका में यह भी कहा गया है कि समान परिस्थितियों के बावजूद आगरा में कार्रवाई न होना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन भी है। राज्य के “साइट मैनेजमेंट प्लान (2020–2030)” और “वर्किंग प्लान (2024–2034)” में भी इस प्रजाति को हटाकर देशी वृक्षारोपण की सिफारिश की गई है, लेकिन इन योजनाओं को लागू नहीं किया गया।
कानूनी तौर पर याचिका में अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ और संतुलित पर्यावरण के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए राज्य की निष्क्रियता को चुनौती दी गई है। साथ ही ‘प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल’ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संभावित पर्यावरणीय नुकसान की स्थिति में कार्रवाई टालना उचित नहीं है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं कि विलायती बबूल को चरणबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से हटाकर उसकी जगह देशी प्रजातियों का रोपण किया जाए। साथ ही पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर नियमित प्रगति रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की जाए।
यह मामला न केवल आगरा के पारिस्थितिक संतुलन से जुड़ा है,बल्कि देशभर में आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।

