हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ पूरन डावर 'चिंतक एवं विश्लेषक'
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा स्वतंत्र, निष्पक्ष और भयमुक्त चुनावों में बसती है। लेकिन जब राजनीतिक हिंसा, भय और दबाव का माहौल बनता है, तो लोकतंत्र की यह आत्मा आहत होती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से ऐसे ही आरोपों और घटनाओं के कारण चर्चा में रही है,जहाँ चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा और टकराव की खबरें सामने आती रही हैं।
लोकतंत्र पर धब्बा,ममता अपने नाम के अर्थ पर भी धब्बा,रक्त रंजित राजनीति,सैकड़ों मारे जाते रहे ,कोई बोल नहीं सकता,पंचायत चुनाव में कोई खड़ा नहीं हो पाता था।
लंबे समय बाद पहले मार्क्सवादी और अब ममता से बंगाल को रक्त रंजित राजनीति से मुक्ति मिली है।यद्यपि में राजनैतिक प्रतिशोध का विरोधी हूँ लेकिन ममता को सैकड़ों राजनीतिक हत्याओं के लिए बड़ी सज़ा भी मिलनी ही चाहिए।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य की राजनीति पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि पंचायत चुनावों में आम नागरिक और विपक्षी कार्यकर्ताओं के लिए माहौल अनुकूल नहीं रहा। यह धारणा भी बनी कि कई स्थानों पर लोग खुलकर अपनी राजनीतिक भागीदारी नहीं कर पाए। यदि लोकतंत्र में कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने या अपनी बात रखने से डरता है, तो यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है।
हालाँकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी प्रकार के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्य सामने आए। लोकतंत्र में किसी भी नेता या दल को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। यदि कहीं भी राजनीतिक हिंसा हुई है, तो उसके दोषियों को सख्त सजा मिलनी ही चाहिए,चाहे वे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़े हों।
हमारा मानना है कि राजनीति में प्रतिशोध की भावना का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गंभीर आरोपों को नजरअंदाज कर दिया जाए। न्याय और जवाबदेही लोकतंत्र के अनिवार्य स्तंभ हैं,और इनसे समझौता नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर एम के स्टालिन के संदर्भ में भी वैचारिक विवाद सामने आए हैं।वे सनातन को समाप्त करने में लगे थे।सनातन को चुनौती मतलब सृष्टि को चुनौती। हश्र सबके सामने है अपनी और अपने पुत्र की सीट भी हारे।
विशेषकर सनातन परंपरा को लेकर दिए गए बयानों के कारण। भारत जैसे देश में, जहाँ विविध आस्थाएँ और संस्कृतियाँ साथ-साथ चलती हैं, वहाँ किसी भी परंपरा या विश्वास को नकारने के बजाय संवाद और सम्मान का मार्ग अपनाना ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। सनातन केवल आस्था नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा है, जो समाज के बड़े हिस्से की पहचान से जुड़ी है।
अंततः लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का प्रतीक है। जब तक राजनीति में पारदर्शिता, जवाबदेही और आपसी सम्मान नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र की मजबूती अधूरी ही रहेगी। यह समय है जब सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और यह सुनिश्चित करें कि देश की लोकतांत्रिक गरिमा किसी भी परिस्थिति में आहत न हो।
हर-हर महादेव.. 🙏

