हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा, 24 जुलाई। हज़रत सैय्यदना शाह अमीर अबुल उला (रह.) के 387वें उर्स मुबारक के अवसर पर शुक्रवार को दरगाह शरीफ में परंपरागत रूप से गुस्ल, संदलमाली और चादरपोशी का आयोजन किया गया। गुस्ल की रस्म सज्जादानशीन एवं मुतवल्ली हज़रत सैय्यद मोहतशिम अली अबुल उलाई ने रिवायत के अनुसार संपन्न कराई।
इस दौरान नायब सज्जादगान सैय्यद विरासत अली अबुल उलाई, सैय्यद इशाअत अली अबुल उलाई और सैय्यद कैफ अली अबुल उलाई के साथ ज़ाकिर अली दानिश (हैदराबाद), सूफी ज़ुबेर मियां (हैदराबाद), मौलाना सैय्यद अमीन मियां (अजमेर), मौलाना निज़ाम उद्दीन हारूनी चिश्ती (हैदराबाद), सैय्यद इकबाल अली, सैय्यद अरीब अली, सैय्यद आसिम अली, सैय्यद शहाब अली, सैय्यद अज़हर अली तथा हाजी नौशाद शफीक इरशाद सहित अनेक अकीदतमंदों ने दरगाह पर संदल और चादर पेश की।
रस्मों के उपरांत दरबार-ए-सैय्यदना सरकार में देश में अमन-चैन, आपसी भाईचारा, एकता और खुशहाली के लिए विशेष दुआ की गई। सज्जादानशीन सैय्यद मोहतशिम अली अबुल उलाई ने बताया कि हज़रत सैय्यदना शाह अमीर अबुल उला (रह.) के दादा हज़रत ख्वाजा अमीर अब्दुल सलाम (रह.) मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में समरकंद से अपने परिवार सहित हिंदुस्तान आए थे। यात्रा के दौरान उन्होंने दिल्ली के निकट कस्बा नरेला में कुछ समय विश्राम किया, जहां इस्लामी हिजरी 990 में हज़रत सैय्यदना शाह अमीर अबुल उला (रह.) का जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि हज़रत की शिक्षाएं आज भी इंसानियत, प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश देती हैं।
रिपोर्ट : असलम सलीमी


