महिला इतिहासकार राष्ट्रीय सम्मेलन एवं राष्ट्रीय सेमिनार का समापन, दो दिनों में 147 शोध पत्रों का हुआ प्रस्तुतिकरण
राज्य महिला आयोग अध्यक्ष डॉ. बबीता चौहान की उपस्थिति में दूसरे दिन हुआ शुभारंभ, 26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों की सहभागिता रही विशेष आकर्षण
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। भारतीय इतिहास को विदेशी दृष्टिकोण के बजाय भारतीय सांस्कृतिक चेतना, प्राचीन ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पुनर्लिखने की आवश्यकता है। आगरा और उसके आसपास की सभ्यता के प्राचीन स्वरूप को समझने के लिए नए शोध और ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन जरूरी है। इसी उद्देश्य के साथ डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के इतिहास एवं संस्कृति विभाग तथा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय महिला इतिहासकार राष्ट्रीय सम्मेलन एवं राष्ट्रीय सेमिनार का रविवार को समापन हुआ। दूसरे दिन के उद्घाटन सत्र का शुभारंभ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता चौहान, राष्ट्रीय सह संगठन सचिव संजय कुमार मिश्रा, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की प्रोजेक्ट प्रमुख सुष्मिता पांडे, लखनऊ से श्रद्धा शुक्ला, हैदराबाद से अनुराधा भोसले तथा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. हेमंत धींग मजूमदार ने दीप प्रज्वलित कर किया।
सेमिनार को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. हेमंत धींग मजूमदार ने कहा कि भारत का इतिहास लिखने वाले लोगों ने भारत को उसकी संपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं किया। भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से लिखे जाने की आवश्यकता है। अब तक पुस्तकों में जिस भारत का चित्रण किया गया, वह वास्तविक भारत की संपूर्ण तस्वीर नहीं थी, बल्कि उसमें विदेशी और मुगलिया दृष्टिकोण का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और गौरवशाली अतीत को शोध के माध्यम से सामने लाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने देश के वास्तविक इतिहास से परिचित हो सकें।
राष्ट्रीय सह संगठन सचिव संजय कुमार मिश्रा ने ब्रज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा से गए तो उनके विरह में ब्रजवासियों की आंखों से जो अश्रुधारा बही, वह ब्रज की भावनात्मक और आध्यात्मिक परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा कि ब्रजवासियों के उन आंसुओं की धारा से ही यहां की धरती के भीतर का पानी खारा हो गया। उन्होंने कहा कि ब्रज का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की लोकसंस्कृति, आस्था, परंपराओं और जनभावनाओं में भी इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण सूत्र छिपे हुए हैं।
समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए इतिहास एवं संस्कृति विभाग के अध्यक्ष तथा भारतीय इतिहास संकलन समिति, ब्रज प्रांत के अध्यक्ष प्रो. बीडी शुक्ला ने बताया कि दो दिवसीय सेमिनार में प्रस्तुत शोध पत्रों और ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन से यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया कि आगरा और उसके आसपास की सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को लेकर आर्यों के बाहरी क्षेत्रों से भारत आने और यहां के मूल निवासियों को अनार्य बताने जैसी धारणाओं पर भी नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारत 12 ऋतुओं वाला देश है और यहां प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति की समृद्ध परंपरा रही है। भारतीय ज्ञान और सभ्यता का प्रभाव विश्व के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचा है। ऐसे में भारत की प्राचीन परंपराओं और ऐतिहासिक प्रमाणों का समग्र अध्ययन जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस सेमिनार में शोधार्थियों के साथ स्नातक स्तर के विद्यार्थियों ने भी शोध पत्र प्रस्तुत किए, जो शोध संस्कृति के विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
चार सत्रों में प्रस्तुत हुए 50 शोध पत्र, दो दिनों में कुल 147 शोध पत्रों पर हुआ मंथन :
दूसरे दिन आयोजित सम्मेलन में चार सत्रों के अंतर्गत शोधार्थियों ने 50 शोध पत्र प्रस्तुत किए। दो दिवसीय आयोजन में कुल 147 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें लगभग 9 शोध पत्र ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत हुए। देश के विभिन्न प्रांतों से आए इतिहासकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भारतीय सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व और महिला योगदान से जुड़े विविध विषयों पर अपने शोध एवं विचार साझा किए।
26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों की सहभागिता रही ऐतिहासिक उपलब्धि : प्रो. हेमा पाठक
विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय अध्यक्ष प्रो. हेमा पाठक ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की स्थापना के बाद यह पहला अवसर है, जब एक साथ 26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों को इस प्रकार के आयोजन में आमंत्रित कर उनके शोध और विचारों को साझा करने का मंच प्रदान किया गया। यह विश्वविद्यालय और इतिहास विभाग के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि महिला इतिहासकारों की सक्रिय सहभागिता से इतिहास लेखन में नए दृष्टिकोण और शोध की संभावनाओं को बल मिला है।
शोधार्थियों को प्रमाण पत्र देकर किया सम्मानित :
दो दिवसीय सम्मेलन का समापन सभी शोधार्थियों एवं उपस्थित प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित करने के साथ हुआ। आयोजन ने देशभर के इतिहासकारों, महिला शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को एक साझा मंच प्रदान किया, जहां भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ।
कार्यक्रम का संचालन अर्चना शर्मा और शिवम ने किया। इस अवसर पर अखिलेश कुमार, डॉ. रोहित, स्वतंत्र कटारा, प्रो. राजन दुबे, प्रो. लवकुश मिश्रा, मीडिया प्रमुख हेमंत द्विवेदी आदि उपस्थित रहे।

