जिसके पास हरि, उसकी कभी नहीं होती हार।
मैं तो भक्तों का दास हूँ, भक्त मेरी मुकुट मणि।
संत विजय कौशलजी महाराज ने बताया..भक्त और भगवान का संबंध।
हिन्दुस्तान वार्ता।
आगराः संत विजय कौशल जी महाराज ने गुरुवार को भक्त और भगवान के संबंध पर विस्तृत चर्चा की और कहा कि भगवान भक्त के अधीन होते हैं। जिसके पास हरि पहुंच गए, उसकी हार नहीं हो सकती है। महाराज जी ने भक्त मीरा और अर्जुन के प्रसंगों की विस्तृत चर्चा करते हुए श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।
उन्होंने कहा कि भगवान कहते हैं कि मैं तो भक्तों का दास हूं, भक्त मेरी मुकुट मणि।
कोठी मीना बाजार का मैदान इन दिनों चित्रकूट धाम बना हुआ है। यहां पर श्रद्धा और भक्ति की बयार बह रही है। भक्त को भगवान से जोड़ने का अद्भुत प्रयास चल रहा है, वहीं श्रद्धालुओं को भक्ति की गंगा में स्नान कराया जा रहा है।
व्यास पीठ पर विराजमान संत विजय कौशल महाराज ने कहा कि मन में अशांति हो, शरीर कमजोर हो गया हो, इंद्रियों में चंचलता हो, तब एक ही मंत्र का उच्चारण करो, तो भगवान भक्त की जरूर सुनते हैं-तुम हमारे थे प्रभुजी, तुम हमारे हो, तुम हमारे ही रहोगे, हे मेरे प्रीतम। एसा मान लोगे तो भगवान अपनी सीमा से अभी अधिक आकर सहायता करते हैं।
महाराज जी ने कहा कि आप किसी के लिए कितना भी कर लो। अपने को समर्पित कर दो, लेकिन कोई काम नहीं आएगा। केवल भगवान ही एसे हैं, जो तुरंत सबके काम आते हैं। भगवान कहते हैं, तुम मुझे अपना तो कहो, फिर देखो की मैं काम आता हूं या नहीं।
भक्त मीरा बाई के प्रसंग को भी बहुत ही भाव पूर्वक सुनाया। कहा कि-पद घुंघरू बांध मीरा नाची। वह इतनी मगन हो गई थीं कि सब कुछ भूल गईं। उन पर अत्याचार किए गए, लेकिन वह कृष्ण भक्ति से नहीं डिगी। क्योंकि वह श्रीकृष्ण को अपना प्राणपति मानती थी। रिश्ते के पति से तो कभी भी संबंध खत्म हो जाते हैं, लेकिन प्राणपति हमेशा-हमेशा जुड़े रहते हैं। मीरा का कृष्ण से संबंध शाश्वत था। जब मीरा बाई पर उसके ससुराली जनों द्वारा और अधिक अत्याचार किए, तब तुलसीदास जी जीवित थे। मीरा ने उनसे पूछा क्या किया जाए। तुलसीदास ने पत्र लिखकर जबाव दिया, जो विनय पत्रिका में अंकित है-
जाके प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम सनेही।
यानि जो भगवान की भक्ति में बाधा डालते हैं, वे बैरी समान हैं, उन्हें त्याग दीजिए, चाहे वे बहुत प्रेमी और स्नेही क्यों न हों।
उसके बाद मेवाड़ से मीराबाई वृंदावन आ गईं। वहां ललिता सखि ने मीराबाई को 84 कोस के मंदिरों के दर्शन कराए। लेकिन यहां भी उसके पति ने अत्याचार शुरू कर दिए। वहां से मीराबाई द्वारिका चली गईं , वे वहां भगवान कृष्ण की प्रतिमा में समां गई। वे श्रीकृष्ण के लिए जन्मी थीं, कृष्ण को ही गाया, कृष्ण को ही जीया और कृष्ण में ही समां गईं थीं।
कौरव और पांडवों की चर्चा करते हुए संत विजय कौशल जी ने कहा कि कौरव महाभारत का युद्ध तो उसी समय हार गए थे, जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण को अपने लिए मांग लिया,जबकि दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की सेना को मांगा था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, तुम क्या युद्ध नहीं जीतना चाहते। तुम्हें तो सेना मांगनी चाहिए थे। अर्जुन ने जबाव दिया था, मैं युद्ध हारने को तैयार हूं, हरि त्यागने को तैयार नहीं हूं।
श्रीराम और उनकी विदाई, श्रवण कुमार के पिता के वध का प्रसंग भी बहुत मार्मिता के साथ सुनाया।
दशरथ के अंत समय में मुंह से राम ही निकला। वरना वे नर्क में जाते। अंत समय जो विचार व्यक्ति के मन में आता है, दूसरे जीवन में वही स्वरूप बनता है। मरते समय भी वही भाव आता है, जो जीवन भर सुना और गाया हो। अंत समय भगवान का नाम आए, इसलिए जीवन भर भगवान का भजन गाना चाहिए। वैसे भी-कलियुग केवल नाम अधारा, सुमरि, सुमिर नर उतरहि पारा।
श्रीराम कथा में मुख्य यजमान मुरारी प्रसाद अग्रवाल, पत्नी मीरा अग्रवाल। दैनिक यजमान विजय गोयल रविन्द्र,
मुख्य अतिथि बल्केश्वर महन्त कपिल नागर, प्रमुख चिकित्सक डा आर एस पारिक, मुरारीलाल फतेहपुरिया, हरिशंकर शर्मा (आर एस एस) टी.एन. अग्रवाल"व्यापारी नेता",राकेश अग्रवाल,घनश्याम दास अग्रवाल, महावीर मंगल, संजय गोयल, महेश गोयल, हेमन्त भोजवानी, मीडिया प्रभारी ऋषि अग्रवाल संजय गुप्ता मनोज कुमार सिंघल रमाकान्त गर्ग दिलीप अग्रवाल भगवानदास बंसल विनोद गोयल सुधीर अग्रवाल दिनेश मित्तल अजय किताब राकेश आकांछा देवेश शुक्ला राजेश अग्रवाल शगुन बंसल मनोज अग्रवाल पोली मुकुन्द मंगल गौरव बंसल आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।