हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ डॉ.प्रतिभा रश्मि
आज का युग तकनीक का युग है और इस तकनीकी क्रांति के केंद्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) है। पिछले कुछ वर्षों में AI टूल्स ने हमारे दैनिक जीवन में इतनी गहराई से प्रवेश कर लिया है कि अब इनके बिना जीवन की कल्पना करना कठिन लगता है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक,हम किसी न किसी रूप में AI का उपयोग कर रहे होते हैं। मोबाइल फोन में मौजूद वॉइस असिस्टेंट,ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों के सुझाव,सोशल मीडिया की न्यूज़ फीड, गूगल मेप नेविगेशन ऐप्स और यहां तक कि बैंकिंग सेवाएँ भी AI आधारित तकनीकों पर निर्भर हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या AI टूल्स हमारे जीवन को अधिक सुविधाजनक बना रहे हैं या हम इनके प्रति अत्यधिक निर्भर होते जा रहे हैं?
दैनिक जीवन में AI के कई सारे लाभ ही दिखाई दे रहें हैं। आज हम स्मार्टफोन पर मौजूद वर्चुअल असिस्टेंट जैसे Google Assistant और Alexa से केवल बोलकर मौसम, समाचार या किसी स्थान की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। पहले जहाँ किसी जानकारी के लिए किताबें खंगालनी पड़ती थीं, वहीं अब कुछ सेकंड में उत्तर मिल जाता है। इसी प्रकार,यात्रा के दौरान Google Maps हमें ट्रैफिक की स्थिति बताकर सबसे तेज़ मार्ग सुझाता है। इससे समय की बचत होती है और यात्रा अधिक सुगम बनती है। मनोरंजन के क्षेत्र में भी AI का प्रभाव स्पष्ट है। YouTube और Netflix जैसे प्लेटफॉर्म हमारी पसंद के अनुसार वीडियो और फिल्में सुझाते हैं, जिससे हमें अपनी रुचि का कंटेंट खोजने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भी भारत में AI ने क्रांतिकारी परिवर्तन किया है। भारत में Unified Payments Interface यानी UPI ने लेन-देन की प्रक्रिया को अत्यंत सरल और तेज़ बना दिया है। केवल मोबाइल फोन के माध्यम से कुछ ही सेकंड में भुगतान किया जा सकता है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारी तक, सभी UPI के माध्यम से भुगतान स्वीकार कर रहे हैं। UPI में धोखाधड़ी रोकने के लिए OTP और पिन जैसी सुरक्षा प्रणालियाँ भी मौजूद हैं, जिनमें AI आधारित निगरानी प्रणाली संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी UPI ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है और वित्तीय समावेशन को मजबूत किया है।
शिक्षा के क्षेत्र में AI टूल्स ने एक नई क्रांति ला दी है। छात्र अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से कठिन विषयों को सरल भाषा में समझ सकते हैं। डिजिटल क्लासरूम,स्मार्ट कंटेंट और व्यक्तिगत शिक्षण पद्धतियाँ विद्यार्थियों की क्षमता और गति के अनुसार सामग्री उपलब्ध कराती हैं। इससे शिक्षा अधिक समावेशी और प्रभावी बन रही है। शिक्षक भी AI की सहायता से विद्यार्थियों की प्रगति का विश्लेषण कर सकते हैं और उनकी कमजोरियों पर विशेष ध्यान दे सकते हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्मार्टवॉच और फिटनेस ऐप्स हमारी हृदय गति,नींद और शारीरिक गतिविधियों की निगरानी करते हैं। इससे व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रहा है और समय रहते आवश्यक कदम उठा सकता है।
हालाँकि इन सभी सुविधाओं के साथ एक दूसरी सच्चाई भी जुड़ी हुई है। AI टूल्स की बढ़ती लोकप्रियता ने मानव जीवन में निर्भरता की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया है। आज लोग छोटे-छोटे निर्णय लेने के लिए भी ChatGPT जैसी तकनीक पर निर्भर हो रहे हैं। रास्ता याद रखने की क्षमता कम हो रही है क्योंकि हम हर बार नेविगेशन ऐप का सहारा लेते हैं। गणना करने की सरल क्षमता भी कम होती जा रही है क्योंकि कैलकुलेटर और स्मार्ट डिवाइस तुरंत उत्तर दे देते हैं। इस प्रकार, धीरे-धीरे हमारी स्वाभाविक सोचने और याद रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। गोपनीयता का मुद्दा भी एक गंभीर चिंता का विषय है। AI सिस्टम हमारे व्यवहार, पसंद, स्थान और गतिविधियों का डेटा एकत्रित करते हैं। यह डेटा कंपनियों के लिए अत्यंत मूल्यवान होता है,क्योंकि इसके आधार पर वे हमें लक्षित विज्ञापन दिखाती हैं। कई बार डेटा लीक या साइबर अपराध के कारण व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग भी हो सकता है। इस स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या सुविधा के बदले हम अपनी निजता को जोखिम में डाल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, ऑटोमेशन के कारण रोजगार के अवसरों पर भी प्रभाव पड़ रहा है। कई ऐसे कार्य जो पहले मनुष्य करते थे, अब मशीनें करने लगी हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
AI टूल्स के बढ़ते उपयोग का एक सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिलता है। लोग आमने-सामने बातचीत करने की बजाय डिजिटल माध्यमों पर अधिक समय बिताने लगे हैं। इससे सामाजिक संबंधों में दूरी आ सकती है। बच्चे और युवा वर्ग विशेष रूप से AI तकनीक पर अधिक निर्भर हो रहे हैं, जिससे उनकी रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति प्रभावित हो सकती है। यदि हर प्रश्न का उत्तर तुरंत AI से मिल जाए, तो स्वयं खोजने और सोचने की आदत कमजोर पड़ सकती है।
हमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपने जीवन में एक सहायक के रूप में स्थान देना चाहिए, न कि उसे अपने निर्णयों का स्वामी बना देना चाहिए। AI एक शक्तिशाली साधन है, जो हमारे कार्यों को सरल, तेज़ और अधिक व्यवस्थित बना सकता है। परंतु यह याद रखना आवश्यक है कि यह मानव बुद्धि का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहयोगी है। यदि हम हर छोटे-बड़े निर्णय के लिए AI पर निर्भर हो जाएंगे, तो हमारी स्वयं की सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। AI से काम लेना समझदारी है,परंतु अपनी समझ और विवेक को त्याग देना उचित नहीं। हमें तकनीक का उपयोग अपनी उत्पादकता बढ़ाने, ज्ञान प्राप्त करने और समय बचाने के लिए करना चाहिए,लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा अपनी नैतिकता, अनुभव और मानवीय संवेदनाओं के आधार पर लेना चाहिए। AI गणना कर सकता है, विश्लेषण कर सकता है, सुझाव दे सकता है, परंतु वह मानवीय भावनाओं, मूल्यों और संवेदनशीलता का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम AI को अपना “सहायक” बनाए रखें। उससे सीखें,उससे सहायता लें, परंतु अपने विवेक और स्वतंत्र सोच को सर्वोच्च स्थान दें। तकनीक हमारे नियंत्रण में रहे, हम तकनीक के नियंत्रण में न आएँ। जब हम इस संतुलन को बनाए रखते हैं,तभी AI वास्तव में हमारे जीवन को सशक्त और समृद्ध बनाने का माध्यम बनता है।
लेखिका - असि.प्रोफेसर,कंप्युटर साइंस विभाग,
डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय,आगरा हैं।

