तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण हाशिये पर : किसी भी पार्टी ने नहीं दिया टिकिट




हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ आचार्य श्री हरि
मैं इस विषय पर विचार करते हुए आश्चर्य और चिंता दोनों का अनुभव करता हूँ कि समाज और राजनीति में कुछ प्रश्नों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती। हाल के संदर्भ में यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय का प्रतिनिधित्व कम हो रहा है,और यदि हाँ, तो इसके पीछे क्या कारण हैं।
यह कहना कि किसी भी राजनीतिक दल ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को बिल्कुल स्थान नहीं दिया, एक व्यापक दावा है जिसकी तथ्यात्मक पुष्टि आवश्यक है। फिर भी, यह सत्य है कि तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत सीमित रहा है। इसके पीछे ऐतिहासिक और सामाजिक कारण महत्वपूर्ण हैं।
तमिलनाडु की राजनीति पर ई. वी. रामासामी (पेरियार) के नेतृत्व में चले आत्मसम्मान आंदोलन का गहरा प्रभाव रहा है। यह आंदोलन सामाजिक असमानता,जातिगत भेदभाव और ब्राह्मण वर्चस्व के विरोध में उभरा था। इसका उद्देश्य समाज में समानता स्थापित करना और पिछड़े तथा दलित वर्गों को राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार दिलाना था।
समय के साथ यह विचारधारा द्रविड़ राजनीति का आधार बनी, जिसे आगे बढ़ाने में एम. करुणानिधि और वर्तमान में एम. के. स्टालिन जैसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस राजनीति में सामाजिक न्याय, आरक्षण और गैर-ब्राह्मण समुदायों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल “ब्राह्मण विरोध” तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक सामाजिक परिवर्तन का प्रयास था। हालांकि इसके परिणामस्वरूप कुछ समुदायों को यह महसूस हो सकता है कि उनका प्रतिनिधित्व कम हो गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो स्थिति एकरूप नहीं है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और कई राज्यों में अलग सामाजिक समीकरण देखने को मिलते हैं,जहाँ विभिन्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाता है। इसी प्रकार भीमराव आंबेडकर और ज्योतिराव फुले जैसे सामाजिक सुधारकों ने समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में कार्य किया, जिनका उद्देश्य किसी एक वर्ग के प्रति घृणा फैलाना नहीं बल्कि समाज को संतुलित बनाना था।
राजनीति में किसी भी समुदाय का प्रतिनिधित्व कई कारकों पर निर्भर करता है—जैसे जनसंख्या, क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण,पार्टी की रणनीति और स्थानीय मुद्दे। इसलिए किसी एक कारण या समुदाय को इसके लिए पूर्णतः जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र में सभी वर्गों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। किसी भी प्रकार का अतिवाद-चाहे वह किसी के पक्ष में हो या विरोध में-समाज को विभाजित करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम संवाद,संतुलन और पारस्परिक सम्मान के आधार पर आगे बढ़ें।

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