नारी शक्ति के सम्मान और प्रकृति संरक्षण का किया आह्वान
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। “सती तुलसी देह त्याग कर गंडकी नदी तथा तुलसी वृक्ष के रूप में परिणत हुईं। प्रत्येक आंगन में लगी तुलसी हमें उस साध्वी की याद दिलाने के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। तुलसी का जल सिंचन और उसे हरा-भरा रखने का संकल्प प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।” यह उद्गार कथावाचक डॉ. दीपिका उपाध्याय ने श्रीशिवमहापुराण प्रवचन के सातवें दिन व्यक्त किए।
गुरु दीपिका योगक्षेम फाउंडेशन द्वारा श्रावण मास के पावन अवसर पर श्रीगोपालजी धाम, दयालबाग में आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा में उन्होंने तुलसी की उत्पत्ति, शंखचूड़ के जन्म, सती तुलसी से उसके विवाह और तुलसी के पातिव्रत्य की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया।
अंधकासुर प्रसंग सुनाते हुए डॉ. उपाध्याय ने कहा कि नारी शक्ति का सम्मान स्वयं देवता भी करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर नारी सौम्य रूप त्यागकर प्रचंड रूप धारण कर सकती है। अंधकासुर के विरुद्ध देव शक्तियों के युद्ध का प्रसंग नारी शक्ति की सामर्थ्य और तेजस्विता का प्रतीक है। उन्होंने समाज से नारी का सम्मान करने का आह्वान किया।
कथा के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए श्रद्धालुओं को तुलसी के पौधे वितरित किए गए। श्रोताओं ने श्रावण मास के पावन अवसर पर प्रकृति संरक्षण, पौधों की देखभाल और स्वच्छता का संकल्प लिया।

