आयु सीमा से लेकर शिक्षक पात्रता तक पर सवाल | सरकारी पोर्टल पर रिकॉर्ड नहीं, एक ही नाम कई जगह होने का दावा | संस्तुति और समय-सीमा की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में | मंडलायुक्त और मुख्य निर्वाचन अधिकारी से जांच की मांग
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। विधान परिषद के आगरा खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने पूरी निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं ने मतदाता सूची में करीब 8 हजार संदिग्ध नाम शामिल किए जाने का दावा करते हुए आरोप लगाया है कि सूची तैयार करने की निर्धारित प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।
मामला सिर्फ कुछ नामों की पात्रता तक सीमित नहीं बताया जा रहा, बल्कि शिकायत में आयु सीमा, शिक्षक होने की पात्रता, सरकारी पोर्टल पर दर्ज विवरण, एक ही व्यक्ति के नाम की पुनरावृत्ति, आवेदन की संस्तुति और निर्धारित समय-सीमा तक पर सवाल उठाए गए हैं।
शिक्षक नेताओं समेत संबंधित संगठनों की ओर से इस मामले में मंडलायुक्त आगरा और मुख्य निर्वाचन अधिकारी, लखनऊ को शिकायत भेजे जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कथित अनियमितताओं से संबंधित नामों और साक्ष्यों की सूची भी अधिकारियों को उपलब्ध कराई गई है।
8 हजार नाम आखिर कैसे पहुंचे सूची में ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायतकर्ताओं का दावा सही है तो हजारों ऐसे नाम मतदाता सूची तक कैसे पहुंचे, जिनकी पात्रता पर सवाल उठाए जा रहे हैं? शिकायतकर्ताओं के मुताबिक करीब 8 हजार मतदाताओं की पात्रता संदिग्ध बताई जा रही है। उनका दावा है कि सूची की जांच करने पर ऐसे नाम सामने आए हैं, जो निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरते। अब सवाल यह है कि आवेदन प्राप्त करने से लेकर मतदाता सूची में नाम शामिल करने तक किन स्तरों पर इन आवेदनों की जांच हुई? क्या सभी दस्तावेजों का सत्यापन किया गया? यदि किया गया तो शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाई गई आपत्तियां किस आधार पर उत्पन्न हुईं ? इन सवालों का जवाब निर्वाचन अधिकारियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
आयु सीमा पर भी सवाल, फिर कैसे बनी पात्रता ?
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सैकड़ो ऐसे लोगों को भी मतदाता बनाया गया है, जो निर्धारित आयु संबंधी पात्रता पूरी नहीं करते। जो चुनाव कार्यालय से जारी सूची में सामने ही दिखाई पड़ रहे हैं उसके भी दस्तावेज शिकायत कर्ता ने अपनी शिकायत के साथ प्रस्तुत किए
यदि यह आरोप दस्तावेजी जांच में सही पाया जाता है तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि आवेदन की प्रारंभिक जांच के दौरान आयु संबंधी अभिलेखों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। यही वजह है कि शिकायतकर्ताओं ने संदिग्ध नामों की सूची का संबंधित मूल अभिलेखों से मिलान कराने की मांग की है।
सरकारी पोर्टल पर शिक्षक नहीं, फिर मतदाता कैसे ?
मामले का दूसरा अहम पहलू सरकारी पोर्टल पर शिक्षकों के विवरण से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कुछ ऐसे लोगों के नाम भी मतदाता सूची में शामिल हैं, जिनका विवरण उस सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध नहीं है, जहां संबंधित शिक्षकों का विवरण दर्ज होना चाहिए। यहां जांच का एक सीधा सवाल बनता है कि यदि किसी व्यक्ति का संबंधित रिकॉर्ड सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध नहीं था, तो मतदाता सूची में उसकी पात्रता किस दस्तावेज के आधार पर स्वीकार की गई?इसका जवाब संबंधित रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आ सकता है।
शिक्षक नहीं होने का आरोप भी :
शिकायत में कुछ कथित मतदाताओं की शिक्षक संबंधी पात्रता पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि ऐसे लोगों को भी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में स्थान दिया गया, जिनकी शिक्षक के रूप में पात्रता संदिग्ध है।ऐसे में जांच का दायरा केवल मतदाता सूची तक सीमित न रहकर संबंधित व्यक्तियों के विद्यालय, नियुक्ति, सेवा और पात्रता संबंधी अभिलेखों तक पहुंचना चाहिए।
एक वोटर, दो-दो जगह नाम ?
शिकायत में एक और गंभीर विसंगति का दावा किया गया है कि एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होना।यदि एक ही मतदाता के नाम एक ही पेज पर ऊपर और नीचे पिता के नाम के साथ एक जैसा ही पाए जाते हैं, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि यह वास्तविक दोहरी प्रविष्टि है, शिकायतकर्ताओं ने ऐसे मामलों की पहचान कर रिकॉर्ड के तैयार करके भी साथ में प्रस्तुत किया है और जांच की मांग की है
‘संस्तुति’ की व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल :
मामले में जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शिक्षक मतदाता बनने के लिए प्रस्तुत प्रपत्रों की निर्धारित प्रक्रिया जिला विद्यालय निरीक्षक से संस्तुति होनी चाहिए। आरोप है कि हजारों प्रपत्रों को कथित रूप से इस प्रक्रिया से इतर सीधे निर्वाचन कार्यालय में जमा कराया गया और बाद में उन्हें सूची में शामिल कर लिया गया।
यदि ऐसा हुआ है तो सवाल यह नहीं रहेगा कि सूची में कौन-कौन से नाम गलत हैं, बल्कि यह भी जांच का विषय बनेगा कि आवेदन किस रास्ते से निर्वाचन कार्यालय तक पहुंचे और किस अधिकारी/स्तर पर उनकी जांच हुई।
अंतिम तारीख के बाद आवेदन ?
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ प्रपत्र निर्धारित अंतिम तिथि के बाद जमा कराए गए और उन्हें सूची में शामिल किया गया। यह आरोप बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी निर्वाचन प्रक्रिया में समय-सीमा का पालन पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा होता है।
इसलिए जांच में यह देखा जाना चाहिए कि प्रत्येक संदिग्ध आवेदन कब जमा हुआ, किस कार्यालय में जमा हुआ, किस तारीख को अग्रसारित हुआ, किस अधिकारी ने उसकी संस्तुति की और किस तारीख को उसे निर्वाचन कार्यालय में दर्ज किया गया।रिकॉर्ड सामने आते ही इस सवाल का जवाब मिल सकता है।
क्या बिना संस्तुति के भी पहुंच गए आवेदन ?
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि सभी संबंधित प्रपत्रों का जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय से संस्तुत होना आवश्यक था। इसके बावजूद कुछ नामों को लेकर ऐसी आपत्तियां सामने आई हैं जिनमें संस्तुति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
अब असली परीक्षा दस्तावेजों की होगी :
यदि प्रत्येक नाम के पीछे आवेदन, पात्रता प्रमाण, संबंधित संस्था का रिकॉर्ड और संस्तुति उपलब्ध है तो स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि रिकॉर्ड में अंतर मिलता है तो निर्वाचन अधिकारियों को यह भी देखना होगा कि वह अंतर कैसे और किस स्तर पर पैदा हुआ।
‘खेल’ का दावा, अब जांच से खुलेगा राज :
शिकायतकर्ताओं ने पूरी प्रक्रिया में कथित ‘खेल’ और मिलीभगत के आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जांच एजेंसियों और निर्वाचन अधिकारियों की है। शिकायत में दिए गए नामों और दस्तावेजों का मूल अभिलेखों से मिलान कराया जाता है या नहीं, यही इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।
अधिकारियों के सामने पांच बड़े सवाल :
1. शिकायत में बताए गए करीब 8 हजार संदिग्ध नामों में से कितने वास्तव में पात्र पाए जाते हैं?
2. कितने नामों का संबंधित सरकारी पोर्टल से सत्यापन हुआ?
3. क्या किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है और यदि है तो ऐसे कितने मामले हैं?
4. क्या सभी आवेदनों की निर्धारित प्रक्रिया के तहत संस्तुति हुई थी?
5. क्या अंतिम तिथि के बाद प्राप्त किसी आवेदन को मतदाता सूची में शामिल किया गया?
इन पांच सवालों के जवाब दस्तावेजों के आधार पर मिल जाएं तो विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
अब निगाह निर्वाचन अधिकारियों की जांच पर :
मामला अब शिकायतों और आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेजी जांच की मांग कर रहा है। शिकायतकर्ताओं ने मंडलायुक्त आगरा और मुख्य निर्वाचन अधिकारी, लखनऊ से हस्तक्षेप करते हुए मतदाता सूची का पुनः सत्यापन कराने की मांग की है।
यदि जांच में शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय करने और अपात्र प्रविष्टियों पर कार्रवाई की जरूरत होगी। वहीं यदि आरोप दस्तावेजों की जांच में सही नहीं पाए जाते हैं तो निर्वाचन अधिकारी तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक कर सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब 8 हजार नामों को लेकर उठी आपत्तियों की जांच कितनी गहराई से होगी और जांच के बाद मतदाता सूची की वास्तविक तस्वीर क्या सामने आएगी?

