हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ डॉ. प्रमोद कुमार
भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां विभिन्न धर्मों,भाषाओं और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। यही विविधता भारतीय समाज की विशेषता है। विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास, बड़े बुनियादी ढांचे, आधुनिक तकनीक और बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा से पूरा नहीं हो सकता। विकसित राष्ट्र की वास्तविक पहचान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, न्यायपूर्ण प्रशासन, सुरक्षित वातावरण, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति, सामाजिक समानता और सम्मानजनक जीवन से होती है। इसके लिए निर्णय लेने की ऐसी संस्कृति आवश्यक है, जो प्रमाण, तर्क, परीक्षण और दीर्घकालीन परिणामों पर आधारित हो।
इसी संदर्भ में राजनीति और सार्वजनिक नेतृत्व में ‘साइंटिफिक टेम्परामेंट’ यानी वैज्ञानिक मनोवृत्ति का महत्व बढ़ जाता है। यहां धार्मिक और वैज्ञानिक टेम्परामेंट का अर्थ किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से नहीं है। कोई व्यक्ति धार्मिक आस्था रखने के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला हो सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब सार्वजनिक नीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था अथवा प्रशासनिक निर्णयों का आधार केवल आस्था, परंपरा या भावनात्मक स्वीकार्यता बन जाए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है कि किसी दावे को प्रमाण, तर्क, परीक्षण और परिणामों के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया जाए। वैज्ञानिक मनोवृत्ति का मूल भाव यह है कि नए प्रमाण सामने आने पर अपनी धारणा बदलने के लिए तैयार रहा जाए। यही गुण लोकतांत्रिक शासन के लिए भी आवश्यक है।
भारत जैसे विशाल देश में राजनेताओं के निर्णय करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए सार्वजनिक नेतृत्व में प्रमाण, विशेषज्ञता और जवाबदेही का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शिक्षा नीति हो या कृषि, स्वास्थ्य, रोजगार, जल प्रबंधन, ऊर्जा, शहरी विकास, जलवायु परिवर्तन अथवा डिजिटल तकनीक-हर क्षेत्र में भावनात्मक दावों की अपेक्षा तथ्यात्मक विश्लेषण अधिक उपयोगी है।
किसी समस्या का समाधान केवल घोषणा या नारे से नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि लागत, सिंचाई, बाजार व्यवस्था, भंडारण, परिवहन, फसल विविधीकरण और मौसम संबंधी चुनौतियों का अध्ययन जरूरी है। इसी प्रकार बेरोजगारी से निपटने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल विकास, उद्योग, उद्यमिता और श्रम बाजार के आंकड़ों का विश्लेषण आवश्यक है। यही वैज्ञानिक टेम्परामेंट का व्यवहारिक रूप है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है। महामारी, टीकाकरण, पोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य अथवा किसी उपचार से संबंधित निर्णय वैज्ञानिक अनुसंधान, सुरक्षा और प्रभावशीलता के प्रमाण पर आधारित होने चाहिए। किसी उपचार को केवल लोकप्रिय, प्राचीन या प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा बताए जाने के कारण सही नहीं माना जा सकता। परंपरागत ज्ञान का सम्मान करते हुए भी उपयोगी दावों की वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने, तर्क करने, प्रमाण खोजने और स्वतंत्र चिंतन की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। प्रश्न करना अविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान की शुरुआत है। लोकतंत्र में भी विपक्ष सरकार से, पत्रकार सत्ता से और नागरिक प्रशासन से प्रश्न करते हैं। स्वस्थ लोकतंत्र में प्रश्नों को राष्ट्र-विरोध या व्यक्ति-विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
वैज्ञानिक टेम्परामेंट का एक महत्वपूर्ण गुण अपनी गलती स्वीकार करने की क्षमता भी है। यदि किसी नीति या योजना के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, तो उसका स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उसमें बदलाव किया जाना चाहिए। केवल इसलिए किसी योजना को जारी रखना कि वह पहले घोषित की जा चुकी है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है।
भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में गणित, चिकित्सा, खगोल, दर्शन और भाषा-विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। परंपरा का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ में किसी बात के उल्लेख मात्र से वह आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य नहीं बन जाती। इसी प्रकार विज्ञान द्वारा किसी पुराने विश्वास पर प्रश्न उठाने का अर्थ उस परंपरा के सांस्कृतिक महत्व को समाप्त करना भी नहीं है। संस्कृति और विज्ञान की अपनी-अपनी कसौटियां हैं।
आधुनिक शासन में विशेषज्ञों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और शहरी नियोजन जैसे जटिल विषयों पर राजनीतिक अनुभव के साथ विशेषज्ञ सलाह भी आवश्यक है। राजनेताओं को वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, अर्थशास्त्रियों, इंजीनियरों और शिक्षाविदों की विशेषज्ञता का उपयोग करना चाहिए। हालांकि विशेषज्ञों की बात को भी प्रमाण और तर्क की कसौटी पर परखना वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ही हिस्सा है।
आज डेटा-आधारित शासन का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। सरकारों के पास बड़ी मात्रा में आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और सही व्याख्या अधिक महत्वपूर्ण है। किसी योजना की सफलता बताने के लिए केवल अनुकूल आंकड़े प्रस्तुत करना और प्रतिकूल आंकड़ों को नजरअंदाज करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। पारदर्शी शासन में सफलता और विफलता दोनों के प्रमाण सामने आने चाहिए।
पर्यावरण, जल संकट, वायु प्रदूषण, भूजल स्तर, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता जैसे विषय भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मांग करते हैं। इन समस्याओं का समाधान भावनात्मक भाषणों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों, स्थानीय परिस्थितियों के अध्ययन, तकनीकी समाधान और दीर्घकालीन योजना से संभव है।
हालांकि वैज्ञानिक टेम्परामेंट का अर्थ यह नहीं कि राजनीति केवल आंकड़ों और तकनीक से चले। मनुष्य भावनाओं, संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक संबंधों से भी जुड़ा है। इसलिए वैज्ञानिकता को मानवीय संवेदनशीलता से जोड़ना आवश्यक है। वैज्ञानिक प्रमाण नीति की प्रभावशीलता बता सकते हैं, लेकिन नीति का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण ही होना चाहिए।
राजनीति में धर्म का प्रश्न संवेदनशील है। भारत में धार्मिक आस्था करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा है। इसलिए धर्म को समाप्त करना समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सार्वजनिक निर्णय संविधान, समानता, जनहित, प्रमाण और तर्क पर आधारित हों। कोई राजनेता व्यक्तिगत रूप से धार्मिक हो सकता है और साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला भी। समस्या धार्मिक होना नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति को केवल धार्मिक विश्वास के आधार पर सही मान लेना है, जबकि उपलब्ध प्रमाण उसके विपरीत हों।
अंततः विकसित भारत का निर्माण केवल सड़कों, पुलों, एक्सप्रेसवे, डिजिटल नेटवर्क और औद्योगिक उत्पादन से नहीं होगा। विकसित राष्ट्र की पहचान उसकी निर्णय लेने की गुणवत्ता से भी होती है। जब शासन समस्या की पहचान करता है, प्रमाण जुटाता है, विशेषज्ञों से सलाह लेता है, नीति लागू करता है और परिणामों के आधार पर उसमें सुधार करता है, तभी वह वैज्ञानिक शासन की दिशा में आगे बढ़ता है।
इसलिए ‘धार्मिक टेम्परामेंट के बजाय वैज्ञानिक टेम्परामेंट’ को धार्मिक आस्था के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक निर्णयों में भावना से ऊपर तथ्य, पूर्वाग्रह से ऊपर तर्क और घोषणा से ऊपर परिणाम को रखने के सिद्धांत के रूप में समझना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन में आस्था व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक पद पर निर्णय की कसौटी संविधान, जनहित, प्रमाण और विवेक होना चाहिए।
भारत की शक्ति उसकी विविधता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, वैज्ञानिक क्षमता, युवा आबादी और तकनीकी प्रतिभा में है। विकसित भारत की यात्रा में ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जो परंपरा का सम्मान करे, लेकिन प्रश्न पूछने से न डरे; आस्था का सम्मान करे, लेकिन प्रमाण को न छोड़े; और राजनीतिक लोकप्रियता के साथ दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित को भी प्राथमिकता दे।
विकसित भारत का सपना तभी स्थायी रूप से साकार होगा, जब विकास की राजनीति भावनात्मक ध्रुवीकरण से आगे बढ़कर ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, वैज्ञानिक सोच और प्रमाण-आधारित नीति निर्माण पर केंद्रित होगी।
लेखक-डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

