बच्चों की लगातार खांसी को न समझें मामूली, टीबी का भी हो सकता है संकेत

 



वायरल के दौर में बुखार, खांसी, गले में खराश और सुस्ती दिखे तो रहें सतर्क

शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों में गैस्ट्रिक लैवेज तकनीक से हो रही टीबी की जांच

हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो

आगरा, 7 सितंबर। वायरल संक्रमण के बीच बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर अभिभावकों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। इन दिनों बच्चों में खांसी, बुखार, गले में खराश, कमजोरी और सुस्ती जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में हर खांसी को मौसम का असर या एसी-पंखे की वजह मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार बनी रहने वाली खांसी एलर्जी के साथ-साथ टीबी का भी संकेत हो सकती है।

यह कहना है जिला क्षय रोग अधिकारी (डीटीओ) डॉ. सुखेश गुप्ता का। उन्होंने बताया कि वायरल संक्रमण में खांसी और बुखार सामान्य लक्षण हो सकते हैं, लेकिन खांसी लगातार बनी रहे, बच्चा सुस्त हो, भूख कम लगे अथवा वजन नहीं बढ़ रहा हो तो चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। बच्चों को बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा देने से भी बचना चाह

डीटीओ ने कहा कि बुखार, लगातार खांसी, गले में खराश, अत्यधिक कमजोरी या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण होने पर चिकित्सक से परामर्श लें। उन्होंने बच्चों को खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थ, गोलगप्पे, चाट और गन्ने के रस से बचाने तथा बाजार की बर्फ का इस्तेमाल न करने की सलाह दी।

छोटे बच्चों में गैस्ट्रिक लैवेज से टीबी की जांच

शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों में टीबी की जांच के लिए गैस्ट्रिक लैवेज तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। छोटे बच्चे अक्सर बलगम का नमूना उपलब्ध नहीं करा पाते। ऐसे में चिकित्सकीय निगरानी में गैस्ट्रिक लैवेज के माध्यम से नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है। इससे उन बच्चों में टीबी की पहचान में मदद मिलती है, जिनसे सामान्य तरीके से बलगम का नमूना लेना मुश्किल होता है।

यूपी टीबी टास्क फोर्स के चेयरपर्सन डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह ने बताया कि बार-बार बुखार आना, लंबे समय तक खांसी रहना, वजन न बढ़ना या घटना, सुस्ती, भूख न लगना और खांसी में बलगम आना बच्चों में टीबी के प्रमुख संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षणों को सामान्य वायरल समझकर उपचार टालने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।

उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि बच्चे की खांसी कितने समय से है और उसके साथ कौन-कौन से लक्षण हैं, इसकी जानकारी चिकित्सक को जरूर दें। समय पर जांच होने से बीमारी की पहचान और उचित उपचार में मदद मिलती है।