दवाओं की MRP पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पूछा ! PTR से 16% से अधिक क्यों?



₹3,000 में मिलने वाली कैंसर की दवा का MRP ₹27,000,अदालत ने मरीजों और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ पर जताई चिंता

हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो

नई दिल्ली। 29 सितंबर,दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की वास्तविक आपूर्ति कीमत और उन पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा कि सभी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए ऐसी समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती, जिसमें खुदरा विक्रेता को मिलने वाले मूल्य (PTR) और MRP के बीच का अंतर 16 प्रतिशत से अधिक न हो।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ दवाओं के मूल्य-नियमन,चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक नाम से दवा लिखे जाने तथा ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत दवाओं एवं चिकित्सा उपकरणों के मूल्य-निर्धारण से जुड़े केसी जैन बनाम डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ मामलों की सुनवाई कर रही थी।

₹3,000 की दवा का MRP ₹27,000 सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कैंसर की एक दवा का उदाहरण रखा गया,जिसका MRP करीब ₹27,000 था,जबकि वही दवा खुदरा विक्रेता को लगभग ₹3,000 में उपलब्ध कराई जा रही थी। इस बड़े अंतर पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने चिंता जताई।

पीठ ने केंद्र से पूछा कि जब दवाएं और चिकित्सा उपकरण आवश्यक वस्तुओं से जुड़े मूल्य-नियमन के दायरे में आते हैं, तो अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच मूल्य-नियंत्रण की व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों है।

अदालत ने यह भी कहा कि ऊंची MRP का बोझ केवल मरीजों और उनके परिवारों तक सीमित नहीं है। आयुष्मान भारत सहित सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में बढ़ी हुई कीमतों का भुगतान अंततः सरकारी धन से होता है, जिसका असर करदाताओं पर भी पड़ता है।

सरकार ने माना,समाधान की जरूरत :

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समस्या की गंभीरता से असहमति नहीं जताई। उन्होंने कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की आवश्यकता है, जिससे सभी संबंधित पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी समझ के अनुसार कीमतों में इस बड़े अंतर का पूरा लाभ संभवतः दवा निर्माताओं को नहीं मिल रहा है।

गैर-अनुसूचित दवाओं पर शुरुआती MRP का सवाल :

अधिवक्ता जैन ने अदालत को बताया कि अनुसूचित दवाओं के लिए अधिकतम कीमत निर्धारित होती है, जबकि गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माता को शुरुआती MRP तय करने की अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता है। बाद में सामान्यतः एक वर्ष में MRP में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि पर रोक रहती है, लेकिन शुरुआती स्तर पर अत्यधिक MRP तय किए जाने को नियंत्रित करने की व्यवस्था सीमित है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इसी वजह से दवा की वास्तविक व्यापारिक कीमत और मुद्रित MRP के बीच कई गुना अंतर पैदा हो जाता है। गंभीर बीमारियों के इलाज में दवाओं पर होने वाले भारी खर्च से परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है और सरकारी चिकित्सा प्रतिपूर्ति एवं स्वास्थ्य योजनाओं पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

अधिवक्ता जैन ने DPCO, 2013 के पैरा 32 का भी हवाला दिया, जिसके तहत कुछ पेटेंट प्राप्त नई दवाओं को अनुसंधान एवं विकास पर हुए खर्च की भरपाई के उद्देश्य से निश्चित अवधि के लिए मूल्य-नियंत्रण से छूट दी जाती है। इस पर अदालत ने गैर-अनुसूचित दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए अपेक्षाकृत कमजोर मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था के औचित्य पर सवाल उठाया।

83 फीसदी बाजार गैर-अनुसूचित दवाओं का :

फार्मा उद्योग की ओर से अदालत में रखे गए आंकड़ों के अनुसार भारतीय दवा बाजार का अनुमानित आकार करीब ₹2,58,977 करोड़ है। इनमें अनुसूचित दवाओं का बाजार लगभग ₹43,683 करोड़ यानी करीब 17 प्रतिशत है,जबकि गैर-अनुसूचित दवाओं का बाजार लगभग ₹2,15,294 करोड़ यानी करीब 83 प्रतिशत है।

इस आंकड़े के आधार पर गैर-अनुसूचित दवाएं भारतीय दवा बाजार का बड़ा हिस्सा हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन दवाओं की शुरुआती MRP तय करने की व्यवस्था में प्रभावी नियंत्रण से मरीजों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम किया जा सकता है।

ऊंची MRP से दवा की विश्वसनीयता पर भी सवाल :

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने MRP और वास्तविक कीमत के बड़े अंतर के एक अन्य पहलू पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि यदि ₹23,000 MRP वाली दवा किसी मरीज को ₹3,000 में दी जाती है, तो मरीज के मन में यह संदेह पैदा हो सकता है कि दवा नकली या घटिया तो नहीं है।

अदालत की इस टिप्पणी से यह मुद्दा भी सामने आया कि अत्यधिक MRP केवल कीमत से जुड़ा प्रश्न नहीं है, बल्कि इससे दवा की वास्तविक कीमत और विश्वसनीयता को लेकर उपभोक्ता के मन में भ्रम पैदा हो सकता है।

जेनेरिक नाम से दवा लिखने पर उद्योग ने बताईं दिक्कतें :

सुनवाई के दौरान चिकित्सकों द्वारा केवल जेनेरिक नाम से दवा लिखे जाने के प्रस्ताव पर फार्मा उद्योग की ओर से व्यावहारिक कठिनाइयां भी बताई गईं। उद्योग का कहना था कि कई दवाओं में एक से अधिक मॉलिक्यूल होते हैं और मिलते-जुलते नामों के कारण भ्रम या चिकित्सकीय त्रुटि की आशंका हो सकती है।

उद्योग ने यह भी कहा कि यदि केवल जेनेरिक नाम लिखा गया तो मरीज को किस कंपनी की दवा दी जाए, इसका नियंत्रण फार्मेसी और खुदरा विक्रेता के पास अधिक हो सकता है। ऐसी स्थिति में अधिक व्यापारिक मार्जिन वाली दवा को प्राथमिकता दिए जाने की आशंका जताई गई।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध का मुद्दा भी उठा।

याचिकाकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने एंटीबायोटिक दवाओं की कीमत और उनके अनुचित उपयोग का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक के अत्यधिक इस्तेमाल से एंटीबायोटिक प्रतिरोध की गंभीर समस्या बढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार वैध चिकित्सकीय योग्यता नहीं रखने वाले व्यक्ति भी एंटीबायोटिक लिखते हैं।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने स्पष्ट किया कि फिलहाल अदालत का मुख्य ध्यान दवाओं की MRP तय करने की व्यवस्था पर है। एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग और उससे जुड़े अन्य मुद्दों पर अलग से विचार किया जाएगा।

पीठ ने मामले को व्यापक जनहित से जुड़ा बताते हुए शीघ्र निस्तारण की आवश्यकता पर जोर दिया। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

रिपोर्ट : असलम सलीमी