फोटो कैप्शन : धार्मिक आस्था और ऋषि परंपरा की पावन भूमि नैमिषारण्य। लोकभारती द्वारा 84 कोसी परिक्रमा पथ पर प्रत्येक कोस पड़ाव पर पीपल, बरगद और पाकड़ के पौधों से युक्त हरिशंकरी रोपण अभियान चलाया जाएगा।
24 से 29 अक्टूबर तक उत्सवपूर्वक होगा पौधरोपण,प्रत्येक कोस पड़ाव पर छाया, विश्राम, पेयजल और प्रकाश की होगी व्यवस्था
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
सीतापुर। भारतीय संस्कृति,धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने के उद्देश्य से लोकभारती द्वारा नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा पथ पर प्रत्येक कोस पड़ाव पर हरिशंकरी रोपण का अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत 24 से 29 अक्टूबर तक निर्धारित कोस पड़ावों पर उत्सवपूर्वक पौधरोपण किया जाएगा। हरिशंकरी के अंतर्गत एक ही थाले में पीपल, बरगद और पाकड़ के पौधे रोपे जाएंगे। अभियान का उद्देश्य परिक्रमा पथ को हरित बनाने के साथ श्रद्धालुओं के लिए छाया, विश्राम, पेयजल, प्रकाश और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित करना है।
लोकभारती की ओर से इस अभियान की तैयारियां पूरी की जा रही हैं। नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा के कोस पड़ावों का चिह्नांकन किया जा चुका है। प्रत्येक कोस पड़ाव के लिए ग्राम संयोजन समितियों का गठन भी किया गया है। ये समितियां स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से हरिशंकरी का रोपण, पौधों की सुरक्षा और उनके संरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगी। पौधों की सुरक्षा के लिए ईंटों से ट्री गार्ड बनाए जाएंगे।
प्रत्येक कोस पड़ाव पर हरिशंकरी के वृक्षों से भविष्य में सघन छाया विकसित करने की योजना है। इसके साथ बैठने के लिए चारों ओर चबूतरे, पेयजल, प्रकाश और आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी। इस कार्य के समन्वय के लिए चौरासी कोस पड़ाव संयोजन समिति बनाई जा चुकी है। पौधरोपण और उससे संबंधित व्यवस्थाओं में स्थानीय प्रशासन तथा वन विभाग का भी पूर्ण सहयोग रहेगा।
प्रतिदिन दो पड़ावों पर होंगे बड़े आयोजन :
24 से 29 अक्टूबर तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान पहले से निर्धारित 11 प्रमुख पड़ावों में से प्रतिदिन दो पड़ावों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में संतों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं, ग्राम प्रधानों तथा स्थानीय समाज की सहभागिता रहेगी। संबंधित ग्राम की संयोजन टोली भी पौधरोपण एवं आयोजन की व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाएगी।
नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा पर इस अभियान के संचालन में अवध प्रदेश लोकभारती के अवध प्रांत अध्यक्ष एवं एमएलसी पवन सिंह चौहान, लोकभारती अवध प्रांत के संयोजक कमलेश सिंह सहित संतों और लगभग 150 स्थानीय कार्यकर्ताओं की टोली सक्रिय सहभागिता करेगी।
चार प्रमुख तीर्थों की परिक्रमा को हरित बनाने का संकल्प :
लोकभारती पिछले तीन वर्षों से उत्तर प्रदेश के चार प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों की 84 कोसी परिक्रमा पथों पर प्रत्येक कोस पर हरिशंकरी रोपण के अभियान में जुटी है। इसके अंतर्गत मथुरा-वृज, चित्रकूट, अयोध्या धाम और नैमिषारण्य की परिक्रमा परंपराओं से जुड़े मार्गों को हरित बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
मथुरा-वृज: वृज की 84 कोसी परिक्रमा के कोस पड़ावों का चिह्नांकन किया जा चुका है। गोवर्धन परिक्रमा के सात कोसों पर हरिशंकरी रोपण का कार्य वर्ष 2024 में ही पूरा कर लिया गया था। शेष कार्य परिक्रमा पथ के विकास कार्य पूरे होने के बाद किया जाएगा।
चित्रकूट: कामदगिरि पर्वत की पांच किलोमीटर लंबी परिक्रमा पथ पर वर्ष 2024 में 15 हरिशंकरी का रोपण किया गया था। शेष 84 कोसी परिक्रमा पथ पर हरिशंकरी रोपण का कार्य आगामी वर्ष पूरा करने की योजना है।
अयोध्या धाम :
यहां 84 कोसी परिक्रमा पथ पर विकास कार्य पूरे होने के बाद कोस पड़ावों पर हरिशंकरी रोपण किया जाएगा।
नैमिषारण्य: वर्तमान में यहां 84 कोसी परिक्रमा पथ के कोस पड़ावों का चिह्नांकन, ग्राम संयोजन समितियों का गठन और पौधरोपण की तैयारियां की जा रही हैं। 24 से 29 अक्टूबर तक प्रस्तावित अभियान इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
लोकभारती का प्रयास है कि भविष्य में देश की सभी प्रमुख धार्मिक परिक्रमा पथों पर हरिशंकरी का रोपण किया जाए, ताकि धार्मिक आस्था के केंद्रों पर पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ते हुए स्थायी हरित व्यवस्था विकसित की जा सके।
अभियान के तीन प्रमुख उद्देश्य :
कोस पड़ावों की स्थापना एवं जानकारी: प्रत्येक कोस पड़ाव की स्थापना के साथ कोस इकाई की दूरी (लगभग 3.2 किलोमीटर) की जानकारी देना।
ऋषि परंपरा का परिचय :
संबंधित कोस पड़ाव से जुड़े पूर्वस्थापित प्रमुख ऋषि के नाम, उनके महत्व और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा की जानकारी जनसामान्य तक पहुंचाना।
श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं :
प्रत्येक कोस पर छाया, विश्राम, पेयजल, प्रकाश और आवश्यक प्रसाधन सहित बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था विकसित करना।
लोकभारती का यह अभियान धार्मिक परंपराओं के संरक्षण, ऋषि संस्कृति के प्रचार-प्रसार, पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण जनभागीदारी को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास है। हरिशंकरी के वृक्ष आने वाले समय में श्रद्धालुओं और परिक्रमार्थियों को छाया एवं विश्राम देने के साथ प्रकृति संरक्षण का भी संदेश देंगे।


