दैनिक ‘सैनिक’ के बाद उन्होंने ‘विशाल भारत’ में किया था संपादन
हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ आदर्श नंदन गुप्ता
विख्यात साहित्यकार, लेखक और कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय ने आगरा के सैनिक समाचार पत्र से अपनी हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद उनकी पत्रकारिता परवान पर चढ़ी और नवभारत टाइम्स के संपादक रहे और वहीं से वे सेवानिवृत्त हुए थे।
अज्ञेय जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया (आधुनिक कुशीनगर) में हुआ। स्नातकोत्तर की शिक्षा के दौरान उनका सक्रिय संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ। वर्ष 1930 में उन्हें पहली बार गिरफ़्तार किया गया और 1930-36 की अवधि उन्होंने विभिन्न कारावासों में गुज़ारी।
उन्हीं दिनों आगरा के सुविख्यात स्वाधीनता सेनानी और पत्रकार पं.श्रीकृष्णदत्त पालीवाल द्वारा प्रकाशित और संपादित सैनिक अखबार की ख्याति पूरे प्रदेश में फैल चुकी थी। जिसका प्रकाशन उन्होंने सन् 1925 में आगरा से साप्ताहिक पत्र के रूप में किया था। सन् 1935 में साप्ताहिक 'सैनिक' दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा था। राष्ट्रीय आंदोलन में आग उगलने पर अखबार पर बार-बार प्रतिबंध लगते रहे,उसके 8 संपादकों को जेल जाना पड़ा था। अज्ञेय जी सन् 1936 में आगरा आए और सैनिक अखाबर के संपादकीय विभाग में सेवाएं देने लगे थे।
इस प्रकार उनकी हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत आगरा के इस ‘सैनिक’ अखबार से हुई। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ धूंआधार आलेख और समाचार लिखे। लेकिन उनका यहां मन नहीं लगा। वे पहले से ही विख्यात संपादकाचार्य फीरोजाबाद निवासी पं.बनारसीदास चतुर्वेदी के संपर्क में थे। उनके सुझाव पर ‘विशाल भारत’ में संपादक हो गये। जो उस समय कोलकाता से प्रकाशित होता था। लेकिन वहां भी मात्र डेढ़ वर्ष तक कार्य किया।
हिन्दी गृह पत्रिका (4, जनवरी- जून 2019) में प्रकाशित एक आलेख के अनुसार अज्ञेय जी ‘विशाल भारत’ में संपादक होने के बाद साहित्य-जगत में प्रतिष्ठित हुए। इसके बाद सन् 1947 में इलाहाबाद से `प्रतीक' नामक पत्रिका का संपादन शुरु किया। सन् 1965 में हिंदी के प्रसिद्ध पत्र ‘दिनमान’ में संपादक के रूप में नियुक्त किए हुए। कुछ समय तक इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के निदेशक पद पर भी कार्य किया। कुछ दिन ऑल इंडिया रेडियो में रहने के बाद अज्ञेय 1943 में सैन्य सेवा में प्रविष्ट हुए। सन् 1977 में उन्होंने दैनिक पत्र नवभारत टाइम्स के संपादन का भार संभाला और अगस्त 1979 में उन्होंने वहां से अवकाश ग्रहण कर लिया था। अज्ञेय जी को को अंतर्राष्ट्रीय 'गोल्डन रीथ' पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978) प्राप्त हुए थे। उनका निधन चार अप्रैल 1987 को वे इस संसार से विदा हो गए थे।
“पत्रकारिता का युग निर्माता” पुस्तक में उसके लेखक सियाराम लिखते हैं कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय उन पत्रकारों में से थे, जिन्होंने पत्रकारिता में साहित्य के कलेवर को स्थान दिया। उन्होंने साहित्यिक और गैर-साहित्यिक पत्रकारिता में भी सक्रिय महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिन्दी पत्रकारिता में साहित्यिक पत्रकारिता की कम होती भूमिका के प्रति वे सदैव चिंतित रहे। उन्होंने कहा था-‘‘हिंदी पत्रकारिता में बहुत प्रगति हुई है,परंतु साहित्यिक पत्रकारिता में उतनी नहीं हुई है।‘लोक संचार’ पत्रिका में रमेशचंद शाह ने लिखा कि अज्ञेय जी की पत्रकारिता आगरा के ‘सैनिक’ और कोलकाता के ‘विशाल भारत’ से परवान चढ़ी थी।
लेखक- वरिष्ठ पत्रकार हैं।
निवास- ए-3,सीताराम कालोनी, फेस-1,बल्केश्वर,आगरा

