हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना पीड़ितों के कैशलेस इलाज से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई की। न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.बी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस विषय पर गहरी चिंता जताई। फ़िलहाल किसी भी सड़क दुर्घटना पीड़ित को अधिकतम ₹1,50,000 और सात दिन तक का ही कैशलेस इलाज मिलता है लेकिन अब इस सीमा को बढ़ाए जाने की उम्मीद जग गई है।
कोर्ट ने 6 अप्रैल को सौंपी गई समिति की रिपोर्ट पर विचार किया। रिपोर्ट में कहा गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय इस बात की निगरानी करे कि क्या ₹1,50,000 या सात दिन की सीमा में पीड़ितों का सही इलाज हो पा रहा है या नहीं।
अधिवक्ता के.सी.जैन का तर्क : जब बीमा कंपनी की देनदारी असीमित है,तो इलाज की सीमा क्यों ?
वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के.सी जैन ने कोर्ट के सामने एक बेहद ज़रूरी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 162(1) के तहत बीमा कंपनियों को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के इलाज के लिए एक अलग योजना बनानी चाहिए। उन्होंने दलील दी कि जब किसी दुर्घटनाग्रस्त वाहन का थर्ड पार्टी बीमा है और बीमा कंपनी की देनदारी की कोई मौद्रिक सीमा नहीं होती, तो इलाज पर ₹1,50,000 या सात दिन की टोपी क्यों लगाई जाए ?
जैन ने यह भी कहा कि आखिरकार मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) का अवार्ड मिलने पर बीमा कंपनी ही सारा खर्च चुकाती है तो फिर घायल को समय पर इलाज क्यों न मिले? कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए न्याय मित्र गौरव अग्रवाल सड़क मंत्रालय व समिति को कहा कि वह इस पर विचार करके अगली सुनवाई में अपना मत रखे।
समिति ने खुद स्वीकार किया कि 98% पीड़ितों का इलाज ₹60,000 के भीतर हो जाता है लेकिन एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाएं अक्सर बहुत गंभीर होती हैं और ऐसे में मौजूदा सीमा नाकाफ़ी है। इसलिए समिति ने भी सीमा बढ़ाने की उम्मीद जताई।
यूपी का विवादास्पद कानून भी कठघरे में 12 मई को अगली सुनवाई :
इसी सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2019 से 2021 के बीच के मोटर व्हीकल नियम उल्लंघन के मामलों को बंद करने के लिए पास किए गए कानून का मसला भी सामने आया। यूपी सरकार के वकील ने बताया कि इस संबंध में जल्द ही आदेश जारी किया जाएगा और मंत्रिपरिषद ने इसे मंज़ूरी दे दी है। हालांकि,जो मामले गैर-शमनीय (non-compoundable) अपराधों से जुड़े हैं या जहाँ बार-बार उल्लंघन हुए हैं, वे मामले दोबारा जीवित किए जाएंगे और न्यायालय मे मुक़दमे पुनः चलेंगे।
अधिवक्ता जैन ने इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बिना इस तरह का कानून बनाना अवैध है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के मामले में देश में कई वर्षों से पहले स्थान पर है,ऐसे में ट्रैफ़िक नियमों के डर का कारक खत्म करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
अधिवक्ता जैन द्वारा दाखिल अन्य तीन याचिकाएं भी 12 मई 2026 को सूचीबद्ध की जाएंगी। उस दिन कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाने पर भी अहम फ़ैसला आने की संभावना है।
रिपोर्ट : असलम सलीमी

