10 लाख से अधिक यातायात मामलों को बिना जुर्माना समाप्त करने पर उठे सवाल, 3 सितम्बर को होगी अगली सुनवाई
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2017 से 2021 के बीच दर्ज लाखों लंबित ट्रैफिक चालानों को बिना सुनवाई और बिना जुर्माना वसूले समाप्त किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि विषय पर गहन विचार-विमर्श आवश्यक है।
मामले की सुनवाई 13 मई 2026 को हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 8 अप्रैल 2026 को लाए गए नए अध्यादेश को भी रिकॉर्ड पर लिया गया। हालांकि, अध्यादेश के बावजूद अदालत पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई और सरकार से पूछा कि अब कितने ट्रैफिक मामलों पर कार्रवाई होगी तथा कितने मामले पुनः जीवित होंगे। मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 3 सितम्बर 2026 को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला :
उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2023 में कानून बनाकर 1 जनवरी 2017 से 31 दिसम्बर 2021 के बीच मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत दर्ज लाखों लंबित यातायात मामलों को स्वतः समाप्त कर दिया था। सरकार का तर्क था कि पुराने मामलों का बोझ कम करना आवश्यक है, लेकिन सड़क सुरक्षा कार्यकर्ताओं ने इसे कानून पालन और सड़क सुरक्षा के लिए गलत संदेश बताया।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता के.सी. जैन ने 14 मई 2024 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि संसद द्वारा बनाए गए मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 200 के अनुसार किसी ट्रैफिक मामले का निस्तारण केवल निर्धारित जुर्माना जमा करने पर ही हो सकता है। ऐसे में बिना जुर्माना वसूले मामलों को समाप्त करना केंद्रीय कानून से टकराव है।
10 लाख से अधिक मामले हुए समाप्त :
याचिका में प्रस्तुत परिवहन आयुक्त, उत्तर प्रदेश के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 से 2021 के बीच कुल 30,52,090 ई-चालान हुए थे। इनमें से 10,84,732 मामले न्यायालयों में लंबित थे, जिन्हें बिना जुर्माना जमा किए समाप्त कर दिया गया। यह कुल मामलों का लगभग 42.37 प्रतिशत है।
सरकार को लाना पड़ा नया अध्यादेश :
सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2026 में नया अध्यादेश लाकर कुछ गंभीर मामलों को माफी से बाहर कर दिया। नए प्रावधान के अनुसार गैर-शमनीय अपराध, अनिवार्य कारावास वाले अपराध तथा पुनरावृत्ति वाले ट्रैफिक अपराध अब स्वतः समाप्त नहीं होंगे।
फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संवैधानिक और सड़क सुरक्षा से जुड़े प्रश्न अभी शेष हैं।
समानता के अधिकार का भी मुद्दा :
याचिका में यह भी कहा गया कि जिन लोगों ने समय पर चालान जमा कर दिया और जिन्होंने नहीं किया, दोनों के साथ अलग-अलग व्यवहार हुआ। इससे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का प्रश्न खड़ा होता है।
सड़क सुरक्षा पर गंभीर सवाल :
देश में सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में उत्तर प्रदेश लगातार शीर्ष पर बना हुआ है। वर्ष 2024 में प्रदेश में 24,118 सड़क मौतें दर्ज की गईं, जिनमें 12,010 मौतें ओवर-स्पीडिंग से संबंधित थीं। पिछले पांच वर्षों से उत्तर प्रदेश सड़क मृत्यु के मामलों में देश में पहले स्थान पर है।
अधिवक्ता के.सी. जैन ने क्या कहा :
अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि सड़क पर होने वाली हर मृत्यु केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि किसी परिवार का जीवनभर का दुःख है। उन्होंने कहा कि यदि 57 प्रतिशत लोगों ने कानून का पालन करते हुए जुर्माना जमा किया और शेष 43 प्रतिशत मामलों को बिना दंड समाप्त कर दिया गया, तो यह कानून का पालन करने वालों के साथ अन्याय जैसा प्रतीत होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 1977 से 2021 तक विभिन्न कानूनों के माध्यम से लाखों ट्रैफिक मामलों को समाप्त किया जाता रहा है, जिससे ट्रैफिक नियमों के प्रति नरमी का संदेश जाता है।
रिपोर्ट : असलम सलीमी

