विदेशी आक्रमण के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध का स्वर्णिम अध्याय
हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ डॉ. प्रमोद कुमार
भारतीय इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और आत्मसम्मान की उस जीवंत परंपरा का इतिहास है जिसने भारत को सदियों तक सभ्यता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों का केंद्र बनाए रखा। इसी गौरवशाली परंपरा में 1178 ईस्वी का “कायंदरा का युद्ध” एक ऐसा ऐतिहासिक प्रसंग है, जिसमें गुजरात की वीरांगना रानी नायिका देवी ने राजस्थान के चौहान और परमार राजाओं के सहयोग से विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को पराजित कर भारतीय प्रतिरोध की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की।
बारहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक रूप से अनेक राज्यों में विभाजित अवश्य था, किंतु सांस्कृतिक रूप से वह एक अखंड सभ्यतागत चेतना से जुड़ा हुआ था। इसी काल में मध्य एशिया से तुर्क और इस्लामी आक्रमणों का दबाव बढ़ रहा था। इन आक्रमणों का उद्देश्य केवल राजनीतिक विस्तार नहीं, बल्कि आर्थिक लूट, सामरिक प्रभुत्व और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना भी था।
इसी पृष्ठभूमि में मोहम्मद गौरी का उदय हुआ। उसने भारत को केवल समृद्ध भूमि के रूप में नहीं देखा, बल्कि स्थायी साम्राज्य स्थापना के रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा। सिंध और पंजाब की ओर अपने अभियान चलाने के बाद उसकी दृष्टि पश्चिम भारत के समृद्ध राज्य गुजरात पर पड़ी।
उस समय गुजरात पर चालुक्य (सोलंकी) वंश का शासन था। राजा अजयपाल की मृत्यु के बाद उनका पुत्र मूलराज द्वितीय अल्पवयस्क था, इसलिए शासन की बागडोर उसकी माता रानी नायिका देवी के हाथों में आई। यह भारतीय इतिहास का अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग है कि विदेशी आक्रमण के संकट के समय एक महिला ने न केवल सत्ता संभाली, बल्कि असाधारण नेतृत्व क्षमता का परिचय भी दिया।
रानी नायिका देवी का संबंध गोवा के कदंब वंश से माना जाता है। वे राजनीतिक दृष्टि से प्रशिक्षित, साहसी और दूरदर्शी थीं। उन्होंने समझ लिया था कि यदि गुजरात पर विदेशी आक्रमणकारी सफल हो गया, तो उसका प्रभाव सम्पूर्ण पश्चिम भारत पर पड़ेगा। इसलिए उन्होंने इस संघर्ष को केवल राज्य की सुरक्षा नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का युद्ध माना।
1178 ईस्वी में मोहम्मद गौरी राजस्थान के मरुस्थलीय मार्ग से गुजरात की ओर बढ़ा। उसे विश्वास था कि एक महिला शासक के नेतृत्व वाला राज्य उसकी सेना का सामना नहीं कर सकेगा, किंतु यही उसकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई।
रानी नायिका देवी ने केवल अपनी सेना पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक क्षेत्रीय सहयोग की नीति अपनाई। राजस्थान के नाडोल के राजा कैल्हण चौहान, जालोर के कीर्तिपाल सोनगरा तथा आबू के धारावर्ष परमार सहित अनेक राजपूत शासकों ने उनका साथ दिया। यह घटना इस धारणा का खंडन करती है कि भारतीय राज्य सदैव आपसी संघर्षों में उलझे रहते थे। कायंदरा का युद्ध भारतीय एकता और साझा सुरक्षा चेतना का सशक्त उदाहरण है।
युद्ध का क्षेत्र वर्तमान राजस्थान-गुजरात सीमा के निकट आबू पर्वत के आसपास माना जाता है। रानी नायिका देवी ने पर्वतीय और संकरे मार्गों का रणनीतिक उपयोग किया, जिससे गौरी की विशाल सेना की गति और संगठन दोनों प्रभावित हुए। यह युद्ध केवल शौर्य नहीं, बल्कि उच्च स्तरीय सैन्य रणनीति का भी उदाहरण था।
लोकमान्य परंपराओं में वर्णित है कि रानी नायिका देवी अपने पुत्र को गोद में लेकर युद्धभूमि में उतरी थीं। चाहे इसमें ऐतिहासिक अलंकरण हो, किंतु यह भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति की उस छवि को दर्शाता है जहाँ महिला केवल मातृत्व का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, नेतृत्व और प्रतिरोध की भी प्रतीक होती है।
युद्ध आरंभ होते ही भारतीय सेनाओं ने योजनाबद्ध ढंग से गौरी की सेना को चारों ओर से घेर लिया। चौहान और परमार योद्धाओं की घुड़सवार सेना तथा गुजरात की सैन्य शक्ति के संयुक्त आक्रमण से गौरी की सेना में भारी अव्यवस्था फैल गई। लंबी दूरी तय करके आई सेना पहले ही भौगोलिक और जलवायु संबंधी कठिनाइयों से कमजोर हो चुकी थी।
परिणामस्वरूप मोहम्मद गौरी को करारी हार का सामना करना पड़ा और उसे युद्धक्षेत्र छोड़कर भागना पड़ा। यह उसकी प्रारंभिक भारतीय अभियानों की सबसे बड़ी पराजयों में से एक थी। इस हार के बाद उसने कई वर्षों तक गुजरात की ओर पुनः आक्रमण करने का साहस नहीं किया।
कायंदरा का युद्ध इस तथ्य को स्थापित करता है कि यदि नेतृत्व दूरदर्शी और संगठित हो, तो विदेशी आक्रमणों का प्रभावी प्रतिरोध संभव है। यह युद्ध उस मिथक को भी तोड़ता है कि भारत सदैव विदेशी आक्रमणों के सामने निष्क्रिय रहा। भारतीय इतिहास में अनेक अवसरों पर स्थानीय शक्तियों ने साहस और रणनीति से आक्रमणकारियों को पराजित किया।
नारी शक्ति के संदर्भ में रानी नायिका देवी आधुनिक भारत के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। आज महिला सशक्तिकरण की चर्चा आधुनिक अवधारणा के रूप में होती है, जबकि भारतीय इतिहास यह सिद्ध करता है कि महिलाओं ने सदियों पहले प्रशासन, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा में अपनी असाधारण क्षमता का परिचय दिया था।
कायंदरा का युद्ध हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्रीय एकता केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है। जब विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने मतभेद भुलाकर साझा सभ्यतागत मूल्यों और सुरक्षा के लिए एकजुट होती हैं, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।
यह युद्ध “अखंड भारत” की सांस्कृतिक अवधारणा को भी रेखांकित करता है। यहाँ अखंडता का अर्थ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता है। गुजरात की रानी और राजस्थान के राजपूत शासकों का संयुक्त संघर्ष उस व्यापक भारतीय चेतना का प्रतीक है जिसमें विविधताओं के बावजूद एक साझा सभ्यतागत आत्मा विद्यमान थी।
इतिहास का तटस्थ अध्ययन यह भी बताता है कि मध्यकालीन संघर्ष केवल धार्मिक नहीं थे; उनके पीछे राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक कारण भी थे। किंतु यह भी सत्य है कि विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय समाज को व्यापक विनाश, लूट और अस्थिरता का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में जो शक्तियाँ भारतीय जनजीवन और सांस्कृतिक स्थिरता की रक्षा के लिए खड़ी हुईं, उनका महत्व स्वतः बढ़ जाता है।
आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब रानी नायिका देवी जैसी ऐतिहासिक विभूतियाँ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। वे यह सिद्ध करती हैं कि साहस, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति किसी एक वर्ग या लिंग की बपौती नहीं, बल्कि उन सभी में प्रकट हो सकती है जो अपने समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित हों।
इतिहास की विडंबना यह रही कि अनेक भारतीय वीरांगनाओं को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे अधिकारी थीं। रानी लक्ष्मीबाई व्यापक रूप से प्रसिद्ध हैं, किंतु नायिका देवी जैसी महान वीरांगनाएँ अभी भी जनस्मृति में सीमित हैं। आवश्यकता है कि भारतीय शिक्षा और इतिहासलेखन में ऐसे प्रसंगों को समुचित स्थान मिले ताकि नई पीढ़ी अपने इतिहास के संतुलित और प्रेरणादायक पक्षों से परिचित हो सके।
अंततः, कायंदरा का युद्ध केवल गुजरात की विजय नहीं था, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान, नारी शक्ति और राष्ट्रीय एकता की विजय था। यह युद्ध आज भी हमें यह संदेश देता है कि जब समाज संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होता है, तब कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
रानी नायिका देवी का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास की उस अमर चेतना का प्रतीक है, जो साहस, नेतृत्व और राष्ट्रसमर्पण से प्रेरित होकर आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेगी।
लेखक : डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ.भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा।

