खुद ही सो गए दास्तां कहते-कहते,आगरा की जुबान थे नेबिल स्मिथ साहब

  हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ आदर्श नंदन गुप्ता,वरिष्ठ पत्रकार

आज अचानक पता चला कि शहर के वरिष्ठतम पत्रकार, हमारे शुभचिंतक डा.नेबिल स्मिथ साहब नहीं रहे। सहारनपुर में उनका 24 जून 2026 को निधन हो गया। मन विचलित हो उठा। 

विधिवत पत्रकार मैं भले ही बाद में बना, लेकिन पत्रकार परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन ही पत्रकारों के बीच बीता। तब पत्रकारों के पापा जी यानि श्री टामस स्मिथ साहब की बहुत चर्चा होती थी। कई बार उनके दर्शन करने का भी सौभाग्य मिला। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके आगरा के संबंध में आलेख भी देखे थे। एक बार उनका साक्षात्कार भी उनके घटिया बाजार स्थित आवास पर लिया था।

उनके निधन के बाद उनके सुपुत्र डा.नेबिल स्मिथ साहब सक्रिय हुए और शिक्षक कम,पत्रकारिता में ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त की। वे पत्रकारिता के मिसाल थे, बेहद ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, परिश्रमी थे। कभी किसी विवाद में नहीं, न किसी की बुराई मैं।अपने काम से काम करते हुए वे बहुत आगे बढ़ गये थे।

डा.नेबिल स्मिथ साहब का मुझ पर बहुत स्नेह था। उनके घटिया बाजार स्थित आवास, फिर आवास विकास कालोनी वाले आवास पर मेरा जाना आना होता था। सहारनपुर से भी उनके फोन मेरे पास आते रहते थे। आगरा पर उनकी एक पुस्तक तो प्रकाशित हो गई। दूसरी पुस्तक की जब तैयारी कर रहे थे, तब वे मुझसे लगातार संपर्क में थे। आगरा पर चर्चा होती रहती थी। आगरा के मुहल्लों के नाम भी उन्होंने मुझसे भी लिए थे। 

इतिहास पर उनकी बहुत मजबूत पकड़ थी। किसी भी क्रिश्चियन विद्वान से ज्यादा आगरा के ईसाई समाज व चर्चों का इतिहास उन्हें पता था। श्री टामस स्मिथ साहब भी ने जीवन भर आगरा के बारे में लिखा और नेबिल स्मिथ साहब ने भी। इसलिए इतिहास के मामले में जरा भी कोई ट्रेक से हटता था, उन्हें सहन नहीं होता था। वे तुरंत फोन करके टोकते थे। 

श्री नरेश बिहारी माथुर जी के बाद अब नेबिल स्मिथ साहब ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने एक मिसाल कायम की। अजात शत्रु और मिलनसार थे। वे आगरे का चलता फिरता इतिहास थे। वे भले ही सहारनपुर में प्रवास कर रहे थे, लेकिन उनका मन आगरा में ही रहता था। आगरा के पत्रकार भी उन्हें याद करते रहते थे।

 ताज प्रेस क्लब के हिंदी पत्रकारिता दिवस समारोह में भी क्लब अध्यक्ष मनोज मिश्रा ने उन्हें आमंत्रित किया था,तब वे अस्वस्थ थे,इसलिए उनका आगमन नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने ताज प्रेस क्लब की लाइब्रेरी की अपनी अलमारी देने का संदेश भिजवा दिया था। क्योंकि आगरा के प्रति उनका समर्पण जीवन पर्यंत रहा और लगा कि ताज प्रेस क्लब व आगरा के पत्रकारों के लिए कुछ न कुछ करें। वैसे भी वे मंच, माला, माइक से हमेशा दूर ही रहे।

ताज प्रेस क्लब की सन् 1999 व 2002 में प्रकाशित स्मारिका ओं के संपादक मंडल में रहे और 1999 में स्मारिका आगरा के पत्रकारों के इतिहास पर उन्होंने आलेख लिखा,वहीं वर्ष 2005 की स्मारिका में उनका आलेख था-‘पत्रकारिता बनाम नैतिकता व सभ्य समाज की संरचना’। 

वे आगरा की आवाज थे। आगरा की दास्तां से अपनी कलम के माध्यम से लोगों को दास्तां सुना रहे थे। इसलिए यही उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हुए यही कह सकता हूं कि -

बड़े गौर से सुन रहा था जमाना,

तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते। 

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