आईवीएफ क्लीनिक करीब 6 हजार,भ्रूण वैज्ञानिक सिर्फ ढाई हजार
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। देश में बढ़ती बांझपन की समस्या के बीच प्रशिक्षित भ्रूण वैज्ञानिकों (एम्ब्रियोलॉजिस्ट) की कमी आईवीएफ क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अनुमान के मुताबिक देश में करीब 15 प्रतिशत लोग इन्फर्टिलिटी की समस्या से प्रभावित हैं। वहीं आईवीएफ क्लीनिकों की संख्या बढ़कर करीब 6 हजार हो गई है, जबकि प्रशिक्षित भ्रूण वैज्ञानिकों की संख्या लगभग ढाई हजार ही है। ऐसे में कौशल आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यह बात होटल आईटीसी मुगल में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट, इंडिया की ओर से आयोजित ACE 2026 कार्यशाला में आयोजन समिति के सचिव डॉ. केशव मल्होत्रा ने कही।
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के पहले दिन प्री-कॉन्फ्रेंस के तहत नौ हैंड्स-ऑन वर्कशॉप आयोजित की गईं, जिनमें करीब 500 विद्यार्थियों और चिकित्सकों ने भाग लिया। विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को आधुनिक भ्रूण विज्ञान और आईवीएफ प्रयोगशाला तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।
प्रमुख कार्यशालाओं में ब्लास्टोसिस्ट विकास एवं प्रेडिक्टिव मॉडलिंग, माइक्रोमैनिपुलेशन, विट्रिफिकेशन, स्पर्म सिलेक्शन, क्रायो-क्राइसिस ट्रबलशूटिंग और एम्ब्रियो बायोप्सी वैलिडेशन शामिल रहीं। लाइव डेमो के माध्यम से सूक्ष्म तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया तथा भ्रूण संरक्षण, शुक्राणु चयन, बायोप्सी की सटीकता और भ्रूण विकास रुकने के कारणों एवं उनके समाधान पर विशेषज्ञों ने जानकारी दी।
कार्यशाला में एसीई अध्यक्ष सुजाता रामकृष्णन, इनकमिंग प्रेसीडेंट गौरव मजूमदार, सचिव डॉ. परुषराम गोपीनाथ, डॉ. जयदीप मल्होत्रा, डॉ. निहारिका मल्होत्रा, डॉ. रीता वासेना, डॉ. अनुपम गुप्ता, अम्बर गुप्ता, किया पाराशर, रजनी पचौरी, मीनल जैन, डॉ. सुधा बंसल, रिचा सिंह, डॉ. नीरजा सचदेव, डॉ. कृष्णा चैतन्य आदि मौजूद रहे।




