हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ डॉ.प्रमोद कुमार
भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रमुख आयामों में से गांधीवादी चिंतन व विचार भी एक प्रमुख विषय है। “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो”-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के ये तीन सूत्र भारतीय जनमानस में नैतिक जीवन, आत्मसंयम और सकारात्मक आचरण के अत्यंत लोकप्रिय प्रतीक बन चुके हैं। इनका दृश्य रूप तीन बंदरों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है,-एक आंखें बंद किए हुए, दूसरा कान बंद किए हुए और तीसरा मुंह बंद किए हुए। सामान्य अर्थ में इनका संदेश है कि मनुष्य को बुराई को देखने, सुनने और बोलने से बचना चाहिए। लेकिन यदि इन तीन सूत्रों को केवल नैतिक उपदेश के रूप में न देखकर भारतीय चिंतन की व्यापक परंपरा के संदर्भ में समझा जाए, तो इनके भीतर दृष्टि, श्रवण, वाणी, विचार और आचरण के बीच एक गहरा नैतिक संबंध दिखाई देता है। इसी संदर्भ में बौद्ध दर्शन का अष्टांगिक मार्ग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि ऐतिहासिक और अकादमिक दृष्टि से यह कहना उचित नहीं होगा कि गांधी जी के तीनों सूत्र सीधे-सीधे बौद्ध अष्टांगिक मार्ग से ही उत्पन्न हुए थे, फिर भी दोनों के बीच नैतिक साम्य और वैचारिक प्रतिध्वनि का अध्ययन किया जा सकता है।
तथागत गौतम बौद्ध के दर्शन में दुःख की समस्या और उससे मुक्ति का मार्ग चार आर्य सत्यों के माध्यम से समझाया गया है। चौथा आर्य सत्य उस मार्ग की ओर संकेत करता है जो दुःख की निवृत्ति की ओर ले जाता है और इसे आर्य अष्टांगिक मार्ग कहा गया है। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों में इस मार्ग के आठ अंग बताए गए हैं—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। यह स्पष्ट करता है कि बौद्ध अष्टांगिक मार्ग केवल धार्मिक अनुष्ठानों की सूची नहीं है, बल्कि मनुष्य के देखने, सोचने, बोलने, करने, जीविका अर्जित करने, प्रयास करने, सजग रहने और मानसिक एकाग्रता विकसित करने की समग्र नैतिक-मानसिक पद्धति है।
गांधी जी के त्रिसूत्र को इसी व्यापक संदर्भ में देखने पर एक रोचक समानता सामने आती है। “बुरा मत देखो” को यदि केवल आंखों से किसी वस्तु को देखने तक सीमित कर दिया जाए तो इसका अर्थ बहुत संकीर्ण हो जाएगा। इसका अधिक गहरा अर्थ यह हो सकता है कि मनुष्य अपनी दृष्टि को विकृत, द्वेषपूर्ण, हिंसक और पूर्वाग्रहपूर्ण न बनने दे। बौद्ध चिंतन में “सम्यक दृष्टि” का अर्थ भी मात्र आंखों से देखना नहीं है। वह वस्तुओं और जीवन की वास्तविकता को उचित ढंग से समझने की मानसिक दृष्टि है। बौद्ध ग्रंथ सम्यक दृष्टि को दुःख, उसके उदय, उसके निरोध और उस निरोध की ओर ले जाने वाले मार्ग की समझ से जोड़ते हैं। इसलिए गांधी के “बुरा मत देखो” और बौद्ध “सम्यक दृष्टि” में शब्दशः समानता नहीं, बल्कि नैतिक दिशा की समानता दिखाई देती है। मनुष्य जो देखता है, उसका प्रभाव उसके विचारों पर पड़ता है। विचार उसके भावों को प्रभावित करते हैं और भाव अंततः उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। किसी व्यक्ति, समुदाय या घटना को पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि से देखना आगे चलकर उसके प्रति नकारात्मक धारणा उत्पन्न कर सकता है। इसके विपरीत यदि देखने की प्रक्रिया तथ्य, विवेक और करुणा से नियंत्रित हो तो प्रतिक्रिया अधिक संतुलित हो सकती है। इस अर्थ में “बुरा मत देखो” को अंधापन या वास्तविकता से पलायन का संदेश मानना उचित नहीं है। यदि समाज में अन्याय, हिंसा, शोषण या भ्रष्टाचार है तो उसे देखना और पहचानना आवश्यक है। समस्या “बुराई को देखना” नहीं, बल्कि बुराई को देखकर स्वयं बुराई की मानसिकता से भर जाना है। इसलिए इस सूत्र की व्यवहारिक व्याख्या यह हो सकती है कि मनुष्य बुराई को पहचानते हुए भी अपनी दृष्टि को द्वेष, घृणा और प्रतिशोध से नियंत्रित न होने दे।
यहीं गांधीवादी विचार और बौद्ध दृष्टिकोण के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध दिखाई देता है। गांधी के लिए अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा न करने का सिद्धांत नहीं थी; वह विचार, वाणी और व्यवहार में भी अहिंसकता की अपेक्षा करती थी। दूसरी ओर बौद्ध नैतिकता में भी मानसिक अवस्थाओं और उनके परिणामों पर विशेष बल मिलता है। अष्टांगिक मार्ग का उद्देश्य लोभ, द्वेष और मोह जैसी मानसिक प्रवृत्तियों के क्षय की दिशा में साधना करना है। बौद्ध ग्रंथ अष्टांगिक मार्ग को ऐसे अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो लोभ, द्वेष और मोह को कम करने की दिशा में ले जाता है। इस प्रकार “दृष्टि” का प्रश्न अंततः मन की दिशा का प्रश्न बन जाता है। “बुरा मत सुनो” का संबंध भी केवल कानों से किसी ध्वनि को ग्रहण करने से नहीं है। मनुष्य प्रतिदिन हजारों सूचनाओं, अफवाहों, आरोपों, प्रशंसाओं, आलोचनाओं और भावनात्मक संदेशों के संपर्क में आता है। वह जो सुनता है, उसे सत्य मान लेता है तो उसकी धारणा प्रभावित हो सकती है। आज के डिजिटल युग में यह समस्या और गंभीर हो गई है। सोशल मीडिया, वीडियो, संदेश और त्वरित सूचनाओं ने सूचना की मात्रा को अत्यधिक बढ़ा दिया है, लेकिन सूचना की सत्यता सुनिश्चित नहीं की है। इस परिस्थिति में “बुरा मत सुनो” का आधुनिक अर्थ यह नहीं हो सकता कि मनुष्य अप्रिय या आलोचनात्मक बातों को सुनना ही बंद कर दे। बल्कि इसका अर्थ अधिक तार्किक रूप से यह हो सकता है कि वह झूठ, नफरत, अपमान, अफवाह और अनावश्यक उत्तेजना को बिना जांचे स्वीकार न करे।
बौद्ध अष्टांगिक मार्ग में सम्यक दृष्टि के साथ सम्यक संकल्प और सम्यक वाणी का संबंध भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। यदि मनुष्य जो सुनता है, उसके प्रति विवेकपूर्ण दृष्टि विकसित करता है, तो उसकी प्रतिक्रिया अधिक संतुलित होती है। इसके विपरीत बिना जांचे सुनी गई बातों के आधार पर निर्णय लेना व्यक्ति को पूर्वाग्रह और संघर्ष की ओर ले जा सकता है। आज किसी समुदाय, व्यक्ति या संस्था के बारे में एक अपुष्ट संदेश कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में “सुनने” की नैतिकता केवल धार्मिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का विषय बन जाती है। तीसरा सूत्र—“बुरा मत कहो”—इन तीनों में सबसे प्रत्यक्ष रूप से बौद्ध अष्टांगिक मार्ग के “सम्यक वाणी” से जुड़ता है। बौद्ध ग्रंथ सम्यक वाणी की व्याख्या झूठ, चुगली या विभाजनकारी वाणी, कठोर वाणी और निरर्थक बातों से विरत रहने के रूप में करते हैं। � यह एक महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत है, क्योंकि वाणी केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है; वह संबंध बनाती और बिगाड़ती है, विश्वास पैदा करती और नष्ट करती है, संघर्ष को शांत कर सकती है और उसे बढ़ा भी सकती है।
गांधीवादी दृष्टि से भी वाणी सत्य और अहिंसा से जुड़ी हुई है। सत्य बोलना गांधी के चिंतन में केंद्रीय मूल्य था। लेकिन सत्य बोलने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी हर प्रतिक्रिया को “सत्य” के नाम पर दूसरों पर थोप दे। सत्य के साथ अहिंसा, आत्मसंयम और जिम्मेदारी जुड़ते हैं। किसी व्यक्ति की वास्तविक भूल को इंगित करना और किसी व्यक्ति को अपमानित करना एक ही बात नहीं है। आलोचना और निंदा में भी यही अंतर है। आलोचना किसी कार्य, विचार या नीति की जांच कर सकती है; निंदा अक्सर व्यक्ति को ही लक्ष्य बना देती है। व्यवहारिक नैतिकता का प्रश्न यह है कि हम असहमति व्यक्त करते समय किस भाषा का प्रयोग करते हैं। यहीं गांधी के त्रिसूत्र का आधुनिक महत्व स्पष्ट होता है। आज राजनीतिक बहस से लेकर पारिवारिक संवाद, विश्वविद्यालयों से लेकर कार्यालयों और सोशल मीडिया तक भाषा का स्वर अक्सर अत्यधिक आक्रामक दिखाई देता है। किसी विचार से असहमति व्यक्ति के प्रति अपमान में बदल जाती है। आलोचना व्यक्तिगत आक्रमण बन जाती है और तर्क के स्थान पर आरोप ले लेते हैं। ऐसे वातावरण में “बुरा मत कहो” का अर्थ चुप रहना नहीं बल्कि जिम्मेदार वाणी का अभ्यास करना है। यदि कोई अन्याय हो रहा है तो उसके विरुद्ध बोलना आवश्यक हो सकता है; लेकिन विरोध की भाषा भी तथ्य, मर्यादा और सत्य पर आधारित हो सकती है।
इस बिंदु पर गांधी के त्रिसूत्र और बौद्ध अष्टांगिक मार्ग के बीच एक गहरी समानता दिखाई देती है। दोनों मनुष्य के बाहरी व्यवहार को उसके आंतरिक अनुशासन से जोड़ते हैं। बौद्ध मार्ग में केवल सम्यक वाणी पर्याप्त नहीं है; उसके साथ सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक कर्म और सम्यक स्मृति आदि भी आवश्यक हैं। इसी तरह गांधीवादी नैतिकता में केवल अच्छी भाषा पर्याप्त नहीं है। यदि विचार हिंसक हैं और व्यवहार शोषणकारी है तो केवल मधुर शब्द नैतिकता का प्रमाण नहीं बन सकते। इसलिए गांधी के तीन सूत्रों को अष्टांगिक मार्ग के संपूर्ण विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना दार्शनिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। अष्टांगिक मार्ग आठ परस्पर संबद्ध अंगों की व्यापक साधना है। उसमें नैतिक आचरण के साथ मानसिक अनुशासन और प्रज्ञा का भी समावेश है। “सम्यक दृष्टि” और “सम्यक संकल्प” प्रज्ञा से जुड़े हैं; “सम्यक वाणी”, “सम्यक कर्मान्त” और “सम्यक आजीविका” नैतिक आचरण से; जबकि “सम्यक प्रयास”, “सम्यक स्मृति” और “सम्यक समाधि” मानसिक अनुशासन से संबंधित हैं। इसके मुकाबले गांधी के तीन सूत्र मुख्यतः इंद्रिय-ग्रहण और अभिव्यक्ति के नैतिक नियंत्रण का लोकप्रिय संक्षिप्त रूप हैं।
इस अंतर को समझना आवश्यक है, क्योंकि लोकप्रिय संस्कृति अक्सर जटिल दार्शनिक विचारों को छोटे सूत्रों में बदल देती है। तीन बंदरों की छवि अत्यंत सरल और स्मरणीय है, जबकि बौद्ध अष्टांगिक मार्ग एक विस्तृत नैतिक-आध्यात्मिक अनुशासन है। इसलिए दोनों को पूर्णतः समान मानना सही नहीं होगा। लेकिन तीन सूत्रों को अष्टांगिक मार्ग के कुछ प्रमुख नैतिक आयामों के लोकप्रिय और संक्षिप्त प्रतीक के रूप में पढ़ा जा सकता है। यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है—क्या “बुरा मत देखो” का अर्थ समाज की बुराइयों से आंखें बंद कर लेना है? यदि ऐसा हो तो यह सूत्र सामाजिक नैतिकता के विरुद्ध चला जाएगा। किसी समाज में अन्याय, हिंसा, भेदभाव, भ्रष्टाचार या शोषण हो और नागरिक उन्हें देखने से ही इनकार कर दें, तो सुधार की संभावना समाप्त हो जाएगी। इसलिए इस सूत्र की यथार्थवादी व्याख्या यह होनी चाहिए कि “बुराई को पहचानो, लेकिन अपनी दृष्टि को बुराई से दूषित मत होने दो।” गांधीवादी सक्रियता का व्यवहारिक अर्थ भी यही समझना अधिक उपयुक्त है-अन्याय का विरोध किया जाए, लेकिन विरोध की प्रक्रिया स्वयं हिंसा, घृणा और अमानवीयता में न बदल जाए।
इसी प्रकार “बुरा मत सुनो” का अर्थ आलोचना से बचना भी नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध आलोचना हो तो उसे सुनना, तथ्य जांचना और आवश्यकता होने पर अपनी गलती स्वीकार करना स्वस्थ सामाजिक व्यवहार है। यदि मनुष्य केवल प्रशंसा सुनना चाहता है और आलोचना से बचता है तो वह आत्ममुग्धता का शिकार हो सकता है। अतः इस सूत्र का तार्किक अर्थ यह है कि झूठ, अफवाह और घृणा को बिना विवेक के ग्रहण न किया जाए, जबकि सत्य और उचित आलोचना को सुनने का साहस बनाए रखा जाए। “बुरा मत कहो” के संदर्भ में भी यही संतुलन आवश्यक है। हर कठोर बात बुरी नहीं होती और हर मधुर बात सत्य नहीं होती। डॉक्टर रोगी को बीमारी की वास्तविकता बताता है; शिक्षक विद्यार्थी की गलती बताता है; न्यायपालिका किसी कृत्य को दोषपूर्ण घोषित कर सकती है; पत्रकार किसी सार्वजनिक संस्था की आलोचना कर सकता है। यदि इन सभी को “बुरा कहना” मान लिया जाए तो समाज में सत्य और जवाबदेही की जगह नहीं बचेगी। इसलिए नैतिक कसौटी शब्दों की मिठास मात्र नहीं, बल्कि उनकी सत्यता, उद्देश्य, संदर्भ और संभावित प्रभाव होना चाहिए।
बौद्ध “सम्यक वाणी” भी इसी प्रकार केवल मधुर बोलने का सिद्धांत नहीं है। उसका मूल प्रश्न यह है कि वाणी सत्य, अहिंसक, सार्थक और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से मुक्त है या नहीं। इसलिए कभी-कभी कठोर सत्य भी आवश्यक हो सकता है, लेकिन कठोरता और क्रूरता में अंतर है। सत्य और अपमान में भी अंतर है। असहमति और घृणा में भी अंतर है। यह अंतर समझना ही नैतिक वाणी की वास्तविक परीक्षा है। गांधी और बुद्ध दोनों के संदर्भ में आत्मसंयम का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहरी संघर्ष का एक स्रोत मनुष्य के भीतर भी होता है। यदि मनुष्य अपने क्रोध, लोभ, अहंकार और पूर्वाग्रह को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो उसके शब्द और कर्म उन मानसिक अवस्थाओं की अभिव्यक्ति बन जाते हैं। बौद्ध चिंतन में लोभ, द्वेष और मोह को मानसिक क्लेशों के रूप में देखा गया है और अष्टांगिक मार्ग इनके क्षय की दिशा में ले जाने वाला अभ्यास है। � गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों में भी आत्मानुशासन को केंद्रीय महत्व प्राप्त था।
इस दृष्टि से तीन बंदर केवल “मत देखो, मत सुनो, मत बोलो” का नकारात्मक संदेश नहीं देते। इनके भीतर एक सकारात्मक संदेश भी निहित है—ऐसा देखो जिससे विवेक पैदा हो, ऐसा सुनो जिससे सत्य की समझ विकसित हो और ऐसा बोलो जिससे मानव संबंधों में अनावश्यक हिंसा न बढ़े। यह परिवर्तन “निषेध” से “नैतिक अनुशासन” की ओर ले जाता है। आधुनिक शिक्षा में इस विचार की उपयोगिता विशेष रूप से दिखाई देती है। विद्यार्थियों को केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सिखाना आवश्यक है कि जानकारी का मूल्यांकन कैसे करें, किसी सूचना के स्रोत की विश्वसनीयता कैसे जांचें, असहमति को कैसे व्यक्त करें और डिजिटल माध्यमों पर जिम्मेदारी से संवाद कैसे करें। आज मीडिया साक्षरता, डिजिटल नागरिकता और आलोचनात्मक चिंतन इसी आवश्यकता को संबोधित करते हैं। गांधी का त्रिसूत्र और बौद्ध अष्टांगिक मार्ग आधुनिक भाषा में इन मूल्यों के नैतिक आधार पर विचार करने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
कार्यस्थल पर भी इसका व्यवहारिक महत्व है। किसी सहकर्मी के बारे में अफवाह सुनकर उसे सत्य मान लेना, किसी व्यक्ति के बारे में पूर्वाग्रह विकसित करना या क्रोध में अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना संगठन के वातावरण को प्रभावित कर सकता है। इसके विपरीत तथ्य की पुष्टि करना, व्यक्ति और कार्य के बीच अंतर करना तथा असहमति को मर्यादित भाषा में व्यक्त करना स्वस्थ संस्थागत संस्कृति का निर्माण करता है। इस दृष्टि से “सम्यक दृष्टि” और “सम्यक वाणी” केवल आध्यात्मिक अवधारणाएं नहीं रह जातीं; वे सामाजिक व्यवहार के व्यावहारिक सिद्धांत बन सकती हैं। परिवार में भी यही बात लागू होती है। बहुत से पारिवारिक विवाद किसी बड़ी समस्या से नहीं बल्कि गलत समझे गए शब्द, अधूरी जानकारी, पुरानी शिकायत या जल्दबाजी में की गई टिप्पणी से उत्पन्न होते हैं। यदि व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है, सुनने के बाद सत्यापन करता है और देखने के आधार पर तत्काल निर्णय नहीं लेता तो अनेक अनावश्यक संघर्षों को रोका जा सकता है। इस अर्थ में नैतिक अनुशासन सामाजिक शांति की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण इकाई बन जाता है।
फिर भी इन सूत्रों की एक सीमा को स्वीकार करना चाहिए। केवल बाहरी नियंत्रण से नैतिक व्यक्ति का निर्माण नहीं होता। कोई व्यक्ति बुरा न बोले, लेकिन मन में घृणा रखे; बुरा न सुने, लेकिन स्वयं झूठ फैलाए; बुरा न देखे, लेकिन अन्याय में सहभागी हो-तो केवल प्रतीकात्मक अनुशासन पर्याप्त नहीं होगा। इसी कारण बौद्ध अष्टांगिक मार्ग में दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि को एक समग्र प्रक्रिया में रखा गया है। व्यक्ति का नैतिक विकास केवल भाषा या इंद्रिय-नियंत्रण से नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण जीवन-व्यवहार से निर्धारित होता है। यही बात गांधी के संदर्भ में भी लागू होती है। गांधी के विचारों को केवल तीन बंदरों की लोकप्रिय छवि तक सीमित करना उनके व्यापक सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और सामाजिक जिम्मेदारी के विचार को छोटा कर देगा। तीन बंदर एक प्रतीक हैं; गांधी का नैतिक दर्शन उससे कहीं व्यापक है। उसी प्रकार बौद्ध अष्टांगिक मार्ग को केवल “अच्छा देखो, अच्छा सुनो और अच्छा बोलो” में सीमित करना भी उसके दार्शनिक विस्तार को कम कर देगा।
ऐतिहासिक रूप से भी सावधानी आवश्यक है। तीन बंदरों की प्रतीकात्मक छवि गांधी से जुड़ी हुई है, लेकिन इस प्रतीक का सांस्कृतिक इतिहास गांधी से पुराना है और इसके विभिन्न रूप भारत तथा एशिया में मिलते हैं। इसलिए इसे गांधी द्वारा मौलिक रूप से निर्मित प्रतीक मानना ऐतिहासिक रूप से पर्याप्त सावधानी नहीं होगी। गांधी ने इस लोकप्रिय प्रतीक को अपने नैतिक विचारों के संदर्भ में जिस प्रकार ग्रहण किया, उसका महत्व अलग है। गांधी साहित्य में नैतिकता, अहिंसा और आत्मसंयम पर विस्तृत विचार मिलते हैं; उदाहरण के लिए गांधी के लेखन में अहिंसा को व्यवहारिक जीवन की जटिल परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है। इसलिए प्रतीक के सांस्कृतिक इतिहास और गांधीवादी व्याख्या को अलग-अलग समझना अधिक यथार्थपूर्ण होगा।
बौद्ध अष्टांगिक मार्ग की दृष्टि से भी तीनों सूत्रों का संबंध प्रत्यक्ष एक-से-एक नहीं है। “बुरा मत देखो” को सीधे “सम्यक दृष्टि” कहना शब्दार्थ की दृष्टि से सही नहीं है, क्योंकि सम्यक दृष्टि एक व्यापक दार्शनिक समझ है। “बुरा मत सुनो” का अष्टांगिक मार्ग में कोई समान स्वतंत्र अंग नहीं है। वहीं “बुरा मत कहो” का “सम्यक वाणी” से अपेक्षाकृत स्पष्ट संबंध है। इसलिए इस विषय का गंभीर विश्लेषण समानता के साथ-साथ अंतर को भी स्वीकार करता है। यही तटस्थ और तार्किक दृष्टिकोण है। यदि दोनों परंपराओं को एक साझा नैतिक धरातल पर रखा जाए तो कहा जा सकता है कि दोनों मनुष्य को प्रतिक्रियाशील जीवन से विवेकपूर्ण जीवन की ओर ले जाने का आग्रह करती हैं। जो दिखाई देता है, उस पर तत्काल निर्णय न लेना; जो सुनाई देता है, उसे बिना जांचे स्वीकार न करना; और जो कहना है, उसे बिना सोचे व्यक्त न करना—ये तीनों आधुनिक जीवन में अत्यंत आवश्यक मानसिक आदतें हैं। इनके साथ सही संकल्प, सही कर्म, सही आजीविका, सही प्रयास और सजगता जुड़ जाए तो नैतिक जीवन अधिक व्यापक रूप ले सकता है।
इस प्रकार गांधी जी का त्रिसूत्र और बौद्ध अष्टांगिक मार्ग दो अलग ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भों से आने वाली परंपराओं के बीच संवाद की संभावना प्रस्तुत करते हैं। गांधी का “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो” लोकप्रिय, संक्षिप्त और प्रतीकात्मक नैतिक संदेश है, जबकि बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग मनुष्य के ज्ञान, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका और मानसिक साधना का विस्तृत मार्ग है। दोनों को पूर्णतः एक मानना ऐतिहासिक और दार्शनिक सरलीकरण होगा, लेकिन दोनों में दृष्टि की शुद्धता, वाणी का संयम, मानसिक अनुशासन, अहिंसकता और जिम्मेदार आचरण जैसे साझा नैतिक तत्वों का अध्ययन सार्थक है। आज जब सूचना की गति अत्यधिक तेज है, सामाजिक संवाद अधिक आक्रामक हो रहा है और डिजिटल माध्यमों ने हर व्यक्ति को तत्काल वक्ता और प्रसारक बना दिया है, तब इन नैतिक सूत्रों की प्रासंगिकता नए रूप में सामने आती है। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम क्या देखते, सुनते या कहते हैं; प्रश्न यह भी है कि हम किस प्रकार देखते हैं, किस विवेक से सुनते हैं और किस जिम्मेदारी से बोलते हैं। यही वह बिंदु है जहां गांधी का त्रिसूत्र और बौद्ध अष्टांगिक मार्ग आधुनिक मनुष्य के लिए एक साझा नैतिक संवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।
अंततः “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो” को आंख, कान और मुंह बंद करने की शिक्षा के रूप में नहीं, बल्कि आंख, कान, मन और वाणी को विवेकपूर्ण बनाने की नैतिक चेतना के रूप में समझना अधिक व्यवहारिक होगा। बुराई से आंखें बंद करना समाधान नहीं है; बुराई को पहचानकर उससे स्वयं को बचाना और उसके विरुद्ध उचित ढंग से खड़ा होना अधिक सार्थक है। बुराई सुनना समस्या नहीं, बल्कि सुनी हुई बात को बिना विवेक के स्वीकार कर लेना समस्या है। इसी प्रकार कठोर सत्य बोलना हमेशा बुरा नहीं, जबकि झूठ, अपमान, घृणा और विभाजनकारी वाणी सामाजिक रूप से विनाशकारी हो सकती है। बौद्ध अष्टांगिक मार्ग का “सम्यक” शब्द इसी विवेकपूर्ण संतुलन की ओर संकेत करता है। इसलिए गांधी जी के त्रिसूत्र को बौद्ध अष्टांगिक मार्ग की प्रत्यक्ष ऐतिहासिक उत्पत्ति के रूप में नहीं, बल्कि उसके कुछ नैतिक आयामों के साथ संवाद करती हुई एक लोकप्रिय गांधीवादी अभिव्यक्ति के रूप में देखना अधिक सटीक, यथार्थ और तार्किक होगा। यही दृष्टिकोण दोनों महान परंपराओं के प्रति सम्मान भी बनाए रखता है और उनके बीच के वास्तविक अंतर को भी सुरक्षित रखता है।
लेखक-डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा।

