लोकतंत्र को संदेह से नहीं, सत्य और सुधार से मजबूत करें




हिन्दुस्तान वार्ता ✍️ पूरन डावर 'चिंतक एवं विश्लेषक'

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इतने विशाल देश में करोड़ों मतदाताओं,लाखों मतदान केंद्रों और हजारों प्रत्याशियों के बीच चुनाव कराना सामान्य प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक असाधारण राष्ट्रीय दायित्व है। हमारी चुनाव व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी, लेकिन बिना प्रमाण पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बताना लोकतंत्र की सेवा नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत नींव को कमजोर करना है।

यह समझना भी जरूरी है कि चुनाव आयोग का अपना केंद्रीय सचिवालय अवश्य है, लेकिन चुनाव कराने वाला विशाल मैदानी तंत्र कोई अलग या “गुप्त सेना” नहीं है। राज्यों के शिक्षक, लेखपाल, एसडीएम, जिलाधिकारी और विभिन्न विभागों के सरकारी कर्मचारी चुनावी दायित्व निभाते हैं। ये कर्मचारी अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों और राजनीतिक विचारों से आते हैं। यह मान लेना कि ये सभी किसी एक राजनीतिक दल के समर्थक हैं और संगठित रूप से चुनाव परिणाम बदल सकते हैं, न व्यावहारिक है और न न्याय संगत।

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है :

Special Intensive Revision यानी SIR का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और विश्वसनीय बनाना है,पात्र नागरिकों के नाम सुनिश्चित करना तथा मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित या अन्य कारणों से अपात्र प्रविष्टियों को नियमानुसार ठीक करना। बिहार में 2025 के SIR के दौरान निर्वाचन आयोग ने 2003 की पिछली मतदाता सूची को संदर्भ बनाया था। आयोग ने इसे पात्र मतदाताओं को शामिल करने और अपात्र नामों को हटाने की प्रक्रिया के रूप में बताया था।

मैं स्वयं 1969 से मतदान करता आ रहा हूँ। इस SIR में 2003 की मतदाता सूची को संदर्भ बनाया गया। मेरा मतदान केंद्र बदल चुका था, इसलिए प्रारंभिक सूची में मेरा नाम नहीं आया। मैंने आवश्यक दस्तावेज दिए और मेरा नाम पुनः जोड़ दिया गया। मेरा व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि यदि कहीं नाम छूटता है तो दावा, दस्तावेज और सुनवाई की प्रक्रिया उपलब्ध है।

निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के अनुसार प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद दावे और आपत्तियाँ दर्ज की जा सकती हैं। बिहार SIR 2025 में आयोग ने स्पष्ट किया था कि प्रारूप सूची से किसी नाम को बिना कारण बताए हटाया नहीं जाएगा और दावे-आपत्तियों पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत निर्णय किया जाएगा। अंतिम सूची के संबंध में भी अपील का प्रावधान उपलब्ध है।

किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया में मानवीय त्रुटि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए नागरिकों की सहायता, पर्याप्त समय, सरल दस्तावेजी व्यवस्था और अपील का प्रभावी अधिकार आवश्यक है। लेकिन किसी प्रशासनिक त्रुटि को सीधे किसी जाति, वर्ग, समुदाय या राजनीतिक दल के मतदाताओं को योजनाबद्ध ढंग से हटाने का षड्यंत्र घोषित करना उचित नहीं है। जिस आधार-सूची पर सत्यापन किया जाता है, उसमें पहले से यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि कोई छूटा हुआ मतदाता किस पार्टी को वोट देगा।

चुनाव परिणाम भी महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं :

यदि EVM के माध्यम से इच्छानुसार चुनाव परिणाम बदलना इतना सरल होता, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि भाजपा हर राज्य और हर सीट पर अपनी इच्छा के अनुरूप परिणाम क्यों नहीं ला पाती? तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी अलग-अलग दलों को सफलता मिलती रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी रायबरेली और वायनाड दोनों सीटों से जीते। रायबरेली में उन्हें 3,90,030 मतों के अंतर से और वायनाड में 3,64,422 मतों के अंतर से जीत मिली।

उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37, भाजपा ने 33 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं।इसी प्रकार अगस्त 2026 में बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर विजयी हुए।

 निर्वाचन आयोग के परिणाम के अनुसार उन्होंने 64,151 वोट प्राप्त किए और भाजपा के नीरेज कुमार को 19,324 मतों से हराया। निश्चित रूप से ये उदाहरण अकेले EVM या मतदाता सूची से जुड़े प्रत्येक तकनीकी प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं हैं। लेकिन वे इस व्यापक आरोप पर सवाल जरूर खड़े करते हैं कि चुनावी व्यवस्था केवल एक दल को जिताने के लिए संचालित होती है।

EVM प्रक्रिया में अनेक स्तरों पर निगरानी :

EVM और VVPAT की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी के कई चरण निर्धारित हैं। निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों के अनुसार मशीनों की First Level Checking, प्रत्याशियों या उनके प्रतिनिधियों की उपस्थिति में commissioning, mock poll, सीलिंग, मतदान के बाद स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखे जाने तथा मतगणना के दौरान सील और रिकॉर्ड की जाँच जैसी प्रक्रियाएँ होती हैं। आयोग के अनुसार VVPAT की निर्धारित संख्या की पर्चियों का सत्यापन भी किया जाता है।

निर्वाचन आयोग यह भी बताता है कि EVM स्वतंत्र मशीनें हैं और मतदान प्रक्रिया के दौरान इंटरनेट, वाई-फाई या ब्लूटूथ जैसे नेटवर्क से जुड़ी नहीं होतीं।

सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। जहाँ कमी दिखाई दे, वहाँ प्रमाण प्रस्तुत किए जाने चाहिए, न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए और तकनीकी परीक्षण, अधिक पारदर्शिता तथा आवश्यक सुधार की माँग की जानी चाहिए। लेकिन प्रमाण के स्थान पर केवल आशंका और राजनीतिक बयानबाजी को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को कमजोर करता है।

विपक्ष नहीं,एक सशक्त “विकल्प” :

विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी अनिवार्य शक्ति है। सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन राष्ट्रीय संस्थाओं को लगातार अविश्वसनीय बताना अंततः विपक्ष के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है।

कांग्रेस ने लंबे समय तक देश पर शासन किया। आज भाजपा सत्ता में है और जनता चाहे तो किसी भी दल को अवसर दे सकती है। लोकतंत्र में कोई भी निर्वाचित सरकार स्थायी नहीं होती। सत्ता जनता देती है और जनता ही बदलती है। विपक्ष तभी भविष्य में सत्ता में आ सकता है, जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया, चुनाव, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं में जनविश्वास बना रहे।

यदि हर चुनावी पराजय को षड्यंत्र और हर निर्णय को केवल सड़कों के दबाव से बदलने का प्रयास किया जाएगा, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। लोकतंत्र को कमजोर करना किसी एक दल के हित में नहीं, पूरे राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक नामों और अवधारणाओं को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया है। उसी भावना में “विपक्ष” को केवल विरोध करने वाली शक्ति न मानकर “विकल्प” के रूप में देखा जाना चाहिए।

सरकार कोई विधेयक लाए तो विपक्ष केवल उसे रोकने का प्रयास न करे, बल्कि उससे बेहतर वैकल्पिक प्रारूप प्रस्तुत करे। यदि सरकार को विपक्ष का सुझाव राष्ट्रहित में उचित लगे तो उसे स्वीकार या संशोधित करने में संकोच नहीं होना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार का दायित्व सुनना है और विपक्ष का दायित्व बेहतर समाधान प्रस्तुत करना भी है।

विपक्ष को पुनः जनसमर्थन केवल विरोध से नहीं, बल्कि नीति, कार्यक्रम, वैकल्पिक दृष्टि और सकारात्मक सहयोग से मिलेगा। सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। संस्थाओं को समाप्त करने की भाषा के बजाय उन्हें अधिक निष्पक्ष, उत्तरदायी और पारदर्शी बनाने का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष :

SIR मतदाता सूची को अद्यतन और विश्वसनीय बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था है। इसका क्रियान्वयन संवेदनशील, नागरिक-अनुकूल और पूर्णतः पारदर्शी होना चाहिए, ताकि एक भी पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न रहे। शिकायतों का शीघ्र समाधान हो, दस्तावेजी प्रक्रिया सरल हो और प्रत्येक राजनीतिक दल को निगरानी का समान अवसर मिले,लेकिन सुधार की प्रक्रिया को ही षड्यंत्र बताना और बिना प्रमाण चुनाव आयोग तथा EVM पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता।

लोकतंत्र सरकार और विपक्ष-दोनों की साझा धरोहर है। असहमति रहे, तीखी बहस भी हो, लेकिन चुनावी संस्थाओं को कमजोर करने के बजाय उन्हें और विश्वसनीय बनाया जाए।

विरोध लोकतंत्र का अधिकार है,विकल्प देना लोकतंत्र का दायित्व है।

लोकतंत्र को डिरेल करना किसी दल की रणनीति नहीं,राष्ट्र के भविष्य के लिए आत्मघाती कदम होगा।