गीतों,भावानुवाद और राष्ट्रगान के साथ हुआ आयोजन संपन्न
हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो
आगरा। साहित्य संगीत संगम एवं चेतना इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती के उपलक्ष्य में “टैगोर संगीत संध्या” का आयोजन ग्रीन हाउस, भोगीपुरा में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में गुरुदेव के गीतों, प्रार्थनाओं एवं उनके भावानुवाद की मनमोहक प्रस्तुतियां दी गईं।
कार्यक्रम का शुभारंभ कु. पूजा तोमर द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए चंद्रशेखर शर्मा ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा से विश्व साहित्य आज भी आलोकित हो रहा है। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि डॉ. राजेंद्र मिलन ने कहा कि टैगोर की कविताएं अध्यात्म और जीवन का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. आन्शवना सक्सेना द्वारा रवींद्रनाथ टैगोर की बांग्ला भाषा में रचित प्रार्थना “आभार माथा...” की प्रस्तुति से हुई। इसका भावानुवाद करते हुए सुशील सरित ने कहा — “अपने चरणों तक मेरा मस्तक झुक जाने दे, मेरा अहंकार आंखों के जल में डुबो दे।”
इसके उपरांत गुरुदेव के प्रसिद्ध गीत “एकला चलो रे” का सामूहिक गायन प्रस्तुत किया गया। कु. पूजा ने “मेरे मन में कोई नृत्य करता है” रविन्द्र गीत की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
दुर्ग विजय सिंह दीप ने गुरुदेव की रचनाधर्मिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे ऐसे प्रतिभावान साधक थे जिन्होंने कला के संपूर्ण आयामों को स्वर दिए। हरीश भदौरिया ने कहा कि गुरुदेव ‘भानु’ उपनाम से भी राष्ट्रवादी कविताएं लिखा करते थे।
मातृ दिवस की पूर्व संध्या के अवसर पर अशोक अश्रु ने मां पर आधारित रचनाओं का पाठ किया। गुरुदेव के जीवनवृत्त पर डॉ. रमेश आनंद, विजया तिवारी एवं डॉ. सुषमा सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम में संजय कुमार, डॉ. असीम आनंद, डॉ. नीरज स्वरूप, डॉ. रमेश आनंद एवं इंदल सिंह ‘इंदु’ सहित अनेक साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। संचालन सुशील सरित ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रमेश आनंद ने व्यक्त किया।
अंत में गुरुदेव रचित भारत के राष्ट्रगान “जन गण मन अधिनायक” के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
रिपोर्ट : असलम सलीमी

