हम भूल गये स्वाधीनता संग्राम के यशस्वी पत्रकारों का योगदान
हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ आदर्श नंदन गुप्ता,वरिष्ठ पत्रकार
आगराः अंग्रेजी साम्राज्य की जडें हिलाने में आगरा के समाचार पत्रों की भी अहम भूमिका रही। यद्यपि ताज नगरी में पत्रकारिता का शुभारम्भ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हो चुका था। अनेक छोटे-छोटे पत्र निकले और चिरवयस्क होने से पूर्व ही उनमें से अनेक काल के गर्त में समाते रहे। हम यहां कलम के उन सिपाहियों को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी कलम से अंगारे बरसाए और जुल्मों को सहा था।
श्री राधा मोहन गोकुल जी आगरा के उन मूर्धन्य पत्रकारों में से थे,जिन्होंने प्रदेश व देश के अनेक नगरों से पत्र प्रकाशित किये और उनमें ब्रिटिश नौकरशाहों को उखाड़ फेंकने के विचार प्रकाशित किये। सन् 1924 में महात्मा नन्द गोपाल ने "प्रेम प्रचारक" का प्रकाशन किया। यहीं महात्मा जी कालान्तर से इलाहाबाद के उर्दू साप्ताहिक "स्वराज्य" में गौराशाही के विरुद्ध लेख लिखने पर काले पानी की सजा से दंडित किये गये। स्वाधीन भारत में स्थानीय दयालबाग के प्रेम प्रचारक कार्यालय में उनका प्राणान्त हो गया था। साप्ताहिक " आर्य मित्र" 1898 में निकल चुका था। उस समय उसकी गतिविधि आर्य समाज तक ही सीमित थी। प्रसिद्ध संपादक पं. रुद्रदत्त शर्मा ने उसका सम्पादन प्रारम्भ किया। कालांतर से अनेक संपादकों ने उसका कार्यभार संभाला। पं.हरिशंकर शर्मा "कवि रत्न" तथा पं.धर्मपाल विद्यालंकार ने भी इसमें सक्रिय योगदान दिया। सन् 1925 के ही दिनों काकोरी काण्ड से पूर्व पं. राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्ला खाँ ने " आर्यमित्र" कार्यालय में आश्रय ही नहीं पाया। वरन, रूसी क्रांति के परिप्रेक्ष्य में देश की पुस्तिकाएँ भी छपवाईं। परिणाम स्वरूप काकोरी षड़यन्त्र केस के अन्तर्गत लखनऊ पुलिस ने आकर प्रेस की तलाशी ली और उसके कर्मचारियों से पूछताछ भी की।
सन् 1925 से पं.श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जी ने "साप्ताहिक सैनिक" का प्रकाशन शुरू किया। जिसने सम्पूर्ण स्वाधीनता संग्राम में धूम मचा दी। "सैनिक" के अनेक पत्रकारों को ब्रिटिश नौकरशाही कोपभाजन बनना पड़ा। इनमें सर्वश्री महेन्द्र जी, आचार्य श्री रामशर्मा, संत रामसिंह हिन्दुस्तानी, हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, पं. विद्याशंकर शर्मा, पं. गोपाल प्रसाद व्यास, जीवाराम पालीवाल, देवेन्द्र शर्मा, राम गोपाल इगलासिया, पं. शांति स्वरूप पाठक, पं.प्रकाश नारायण शिरोमणि, पं. गोपाल नारायण शिरोमणि, पं. देवी प्रसाद शर्मा "दिव्य", उल्फत सिंह चौहान 'निर्भय', रमेश वर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। किन्तु साप्ताहिक से दैनिक सैनिक को संघषों में झोंकने का कार्य प्रदेश के सुप्रसिद्ध पत्रकार पं. श्री कृष्णदत्त पालीवाल ने ही किया। वे ही सैनिक के प्राण थे।
आगरा को पत्रकारिता पर लिखते समय ऐसे भी अनेक नाम हैं, जिनका कभी उल्लेख ही नहीं किया गया। उनमें से एक मौलाना पंडित कालीचरण" आर्य मुसाफिर" का है। सन् 1926-27 से लेकर 1930 तक यह पत्र आर्य समाज के प्रचार के साथ राष्ट्रीय आंदोलन की गति भी देता रहा था। इसके सम्पादक हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अरबी के प्रकाण्ड पंडित कालीचरण जी थे। माईथान में " आर्य समाज मुसाफिर" प्रेस सिनेमा के पर्चे छापने का काम करता था। पत्र और प्रेस तो आजीविका की पूर्ति काएक साधन था। आपत्तिजनक लेख लिखने और उनके यहां गरम दल के लोगों के आवागमन की सूचना गुप्तचरों के पास थी।तलाशी हुई और अंत में एक दिन यह प्रेस पुलिस ने छापा मार दिया। पंडित कालीचरण भूमिगत हो गये और फिर वहां से न जाने कहां चले, पता ही नहीं चला।
श्री देवकी नन्दन विभव ने जनजागरण करने के लिए "नवयुग" का संपादन किया,जो अपने समय में बहुचर्चित हो गया था।
पं. देवी प्रसाद शर्मा "दिव्य" के संपादकत्व में प्रकाशित "आगरा पंच " ने सैनिक की तरह ही काँग्रेस का प्रबल समर्थन किया। सन् 1934 में भयानक सांप्रदायिक दंगों में " आगरा पंच" की लोकप्रियता पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी थी। महेन्द्र जी, श्री कपूर चन्द जैन आदि ने महावीर प्रेस को अपना केन्द्र बनाया था। उन्हीं दिनों की हींग की मंडी से उर्दू का "एशिया" साप्ताहिक निकाला गया
राष्ट्रीय आन्दोलन को गुप्त सूचनायें देने के लिए श्री महेन्द्र जी ने ही "सिंहनाद" निकाला। अवैध होने के कारण पत्र को छपने से रोकने के लिए पुलिस जी-तोड़ कोशिश करती रही थी।
सन् 1938 में साप्ताहिक "आशा" का प्रकाशन हुआ। जिसका सम्पादन रोशनलाल गुप्त " करुणेश" ने किया। इसके प्रकाशक वासुदेव गुप्ता जी थे। आपत्तिजनक सामग्री छापने पर अंग्रेज कलेक्टर एस.पी.हार्डी ने जब्त कर लिया था। संपादक करुणेश को यातनाएं दीं। उसी के बाद हार्डी बम कांड का क्रियान्वयन किया गया। 1942 में करुणेश जी ने साप्ताहिक उषा पत्र निकाला, लेकिन जेल चले जाने के कारण यह भी बंद हो गया।
सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक ने सन् 1939 में "नव संदेश" आगरा से ही निकाला। " सन् 1940 में श्री गणपति चन्द ने "उजाला " तथा पं. कालीचरन पांडे ने "संदेश" का प्रकाशन किया। ये दोनों ही दैनिक राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस के प्रबल पक्षधर थे।
सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन " अगस्त क्रांति" के शोले भड़काते हुए आया। देश की भाँति ताज नगरी के समाचार पत्रों का भी गला घोंट दिया गया। प्रेसों पर ताले डाल दिये गये। पत्रकारों को कारागृहों के सींखचों में कैद कर दिया गया। केवल मात्र " आजाद हिन्दुस्तान" शेष रह गया था, जो गोपनीय स्थानों पर छपता, कभी किसी प्रेस में तो कभी साइकलोस्टाइल में। तन की अंतिम सांस तक यही एक ऐसा पत्र था, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी नगर- नगर व गांव-गांव में कांग्रेस कार्यक्रमों का अलख जगाता रहा था।
देशभक्त सम्पादक श्री होतीलाल वर्मा :
आगरा के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में श्री होतीलाल वर्मा को भुलाया नहीं जा सकता । वर्मा जी इलाहाबाद से प्रकाशित उर्दू साप्ताहिक 'स्वराज्य' के सम्पादक थे । इस पत्र की स्थापना दीपावली के शुभ अवसर 1907 को हुई थी । अपने ढाई वर्ष के जीवन काल में इसके 75 अंक प्रकाशित हुए थे। आठ सम्पादकों ने इसका सम्पादन किया, जिनमें से चार को राजद्रोह का अभियुक्त घोषित करके काला पानी में यातनाएं भोगने के लिए समुद्रपार अण्डमान की नारकीय जेल में भेजा गया था। शेष दण्डित हुए और कारागार भेज दिये गये । अण्डमान भेजे जाने वाले वाले सम्पादको में श्री होतीलालवर्मा 'स्वराज्य' के तीसरे सम्पादक थे।
श्री होतीलाल वर्मा को आगरा कालेज के छात्रावास से 25 मई 1908 को बन्दी बना लिया गया। इनकी गिरफ्तारी से 'स्वराज्य' पुनः सम्पादक विहीन होगया था। वर्मा जी को 'पंजाबियों के लिए संदेश' शीर्षक पेम्फलेट बांटने पर भी पांच वर्ष का कठोर कालापानी का कारावास का दण्ड दिया गया। अंडमान की पोर्टब्लेयर जेल की कालकोठरी में रहते हुए वर्मा जी राज- बन्दियों की सुविधाओं के लिए जेल अधिकारियों से संघर्ष करते रहे थे।
सम्पर्क : ए-3,सीताराम कालोनी, बल्केश्वर,आगरा
मो.9837069255

