बंगाल चुनाव : एक छुपा चेहरा जिसकी रणनीति रंग लाई। कर्मचारी-शिक्षक वर्ग को किया संगठित
हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ धर्मेन्द्र कुमार चौधरी
लखनऊ/कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की रणनीतियों के बीच कर्मचारी और शिक्षक संगठनों की सक्रियता भी चर्चा का बड़ा विषय बनी रही। इस पूरे घटनाक्रम में राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष इंजीनियर हरि किशोर तिवारी की भूमिका को पर्दे के पीछे एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
करीब 18 वर्षों से कर्मचारी और शिक्षकों के मुद्दों पर आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके हरि किशोर तिवारी पश्चिम बंगाल में वहां के कर्मचारियों और शिक्षकों की समस्याओं को समझने और उन्हें संगठित करने के उद्देश्य से पहुंचे थे। वहां उन्होंने पाया कि कर्मचारियों को अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम महंगाई भत्ता मिल रहा था तथा सातवें वेतन आयोग के लाभ भी पूरी तरह लागू नहीं हुए थे। इससे कर्मचारियों को प्रतिमाह भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा था।
बताया गया कि पश्चिम बंगाल में कर्मचारी और शिक्षक संगठनों पर लंबे समय से दबाव का माहौल था। आंदोलन की बात करने वाले नेताओं के तबादले या निलंबन जैसी कार्रवाई आम बात मानी जाती थी। ऐसे माहौल में विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन लगातार बैठकों और संवाद के माध्यम से आंदोलन की जमीन तैयार की गई।
27 जनवरी 2026 को कोलकाता के व्यस्त क्षेत्र में लगभग 20 हजार कर्मचारियों और शिक्षकों की विशाल रैली आयोजित की गई। प्रदर्शन के दौरान पुलिस की सख्ती और पानी की बौछारों के बावजूद आंदोलनकारी सड़क पर डटे रहे। इसी मंच से 13 फरवरी की राज्यव्यापी हड़ताल का ऐलान किया गया। हड़ताल के दौरान पहली बार बड़ी संख्या में सरकारी कार्यालयों के प्रभावित होने का दावा किया गया।
आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल ने हरि किशोर तिवारी और विभिन्न कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। बाद में भाजपा की मेनिफेस्टो कमेटी के साथ भी विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें कर्मचारियों और शिक्षकों की मांगों को शामिल करने पर सहमति बनी। इस दौरान पूर्व राज्यसभा सदस्य स्वपन दासगुप्ता भी बैठक में मौजूद रहे।
इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2 मार्च की एक जनसभा में कर्मचारियों और शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग का लाभ देने का आश्वासन दिया। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी चुनावी सभाओं में 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू करने का वादा दोहराया। इस घोषणा के बाद कर्मचारी और शिक्षक वर्ग में भाजपा के प्रति समर्थन का माहौल बनने की चर्चा तेज हो गई।
चुनाव प्रचार के दौरान हरि किशोर तिवारी ने विभिन्न जिलों में कर्मचारी-शिक्षक सभाओं को संबोधित किया। इसी क्रम में बांकुड़ा जिले में एक बैठक के दौरान कथित रूप से टीएमसी समर्थकों द्वारा हमला किए जाने की घटना भी सामने आई। इसमें कई कर्मचारी और शिक्षक घायल हुए। बाद में पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिसके बाद कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई।
भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र, जिसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, वहां भी एक बड़ी रैली आयोजित की गई। प्रारंभ में प्रशासन ने अनुमति नहीं दी, लेकिन अदालत से अनुमति मिलने के बाद हजारों लोगों ने रैली में भाग लिया और सरकार विरोधी नारे लगाए। इसे आंदोलन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना गया।
चुनाव प्रक्रिया के दौरान कर्मचारी संगठनों ने मतदान और मतपत्र व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर भी कई शिकायतें उठाईं। चुनाव आयोग और न्यायालय में शिकायतों के बाद कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव किए गए। आंदोलन से जुड़े नेताओं का दावा है कि इससे चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता बढ़ी और कर्मचारी-शिक्षक वर्ग खुलकर मतदान प्रक्रिया में शामिल हुआ।
सूत्रों के अनुसार हरि किशोर तिवारी करीब डेढ़ माह तक कोलकाता में रहकर लगातार संगठनात्मक गतिविधियों का संचालन करते रहे। उनके साथ विभिन्न शिक्षक और कर्मचारी संगठनों के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी सक्रिय रहे।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय में कर्मचारी-शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी आयोजित हुई, जिसमें आंदोलन के दौरान हुए ट्रांसफर, निलंबन और उत्पीड़न के मामलों पर चर्चा की गई तथा समाधान का आश्वासन दिया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में कर्मचारी और शिक्षक वर्ग की सक्रियता ने चुनावी माहौल को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस पूरे अभियान में इंजी.हरि किशोर तिवारी एक अहम रणनीतिक चेहरा बनकर उभरे।




