दुनिया के सबसे छोटे कथा वाचक 'मधुकंठ दास' पर बन रही फिल्म

 


भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के प्रचार में जुटे बाल संत को देश-विदेश से मिल रहा सम्मान

हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो

मथुरा(वृन्दावन) :  मधुकंठ दास (माधव दुबे) आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार का प्रमुख चेहरा बनते जा रहे हैं। वृन्दावन में जन्मे मधुकंठ दास बचपन से ही अद्भुत आध्यात्मिक प्रतिभा के धनी रहे हैं। बताया जाता है कि जब वे गर्भ में थे, तब उनके माता-पिता नियमित रूप से श्रीमद्भागवत कथा सुनते थे तथा वृन्दावन और गोवर्धन की दंडवती एवं पैदल परिक्रमा किया करते थे।

महज ढाई वर्ष की आयु में उन्होंने भगवद्गीता के श्लोक बोलना प्रारंभ कर दिया था। साढ़े तीन वर्ष की अवस्था में बिना किसी गुरुकुल में अध्ययन किए सैकड़ों संस्कृत श्लोक कंठस्थ कर लिए। पांच वर्ष की आयु में गायत्री मंत्र प्राप्त होने के बाद वे संपूर्ण गीता पर प्रवचन देने लगे। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने गुरु कृपा और ब्रज रज की महिमा से लगभग 2000 श्लोक स्मरण कर लिए।

छह वर्ष की आयु में उन्होंने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन श्रीमद्भागवत कथा प्रारंभ की और अब तक 31 से अधिक कथाएं कर चुके हैं। लंदन, अमेरिका, दुबई, पाकिस्तान सहित कई देशों में ऑनलाइन कथा सुना चुके हैं। वर्तमान में केन्या, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, मस्कट सहित अनेक देशों से उन्हें आमंत्रण प्राप्त हो रहे हैं।

सात वर्ष की अवस्था में मधुकंठ दास ने हार्मोनियम, मृदंग, बांसुरी, करताल, केसियो सहित सात से अधिक वाद्य यंत्र बजाने की कला सीख ली। आठ वर्ष की आयु तक वे आठ ग्रंथों से 2000 श्लोक याद कर चुके थे तथा दस वर्ष की अवस्था में 21 ग्रंथों का अध्ययन एवं प्रवचन करने लगे। संस्कृत श्लोकों का शब्दार्थ सहित व्याख्यान करना उनकी विशेषता मानी जाती है।

उन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है और लोग उन्हें “दुनिया के सबसे छोटे कथा वाचक” के रूप में जानते हैं। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए हेमा मालिनी के सहयोग से उन पर फिल्म “तीर्थ बने महा तीर्थ” बनाई जा रही है, जिसका निर्माण “व्रज की खोज” फिल्म के निर्देशक द्वारा किया जा रहा है।

मधुकंठ दास के पिता पवन दुबे पिछले 15 वर्षों से इस्कॉन गुरुकुल वृन्दावन में सेवा दे रहे हैं। परिवार का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल गुरु महाराज एवं प्रभुपाद के संदेशों का विश्वभर में प्रचार करना है।

सूत्र : पवन दुबे, इस्कॉन वृन्दावन।