जल,जंगल,जीवन और जलवायु पर वैश्विक युद्धोन्माद,प्रभुत्ववादी राजनीति एवं पर्यावरणीय विनाश की त्रासदी"
हिन्दुस्तान वार्ता।डॉ.प्रमोद कुमार
इक्कीसवीं सदी में मानव सभ्यता एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ विकास, प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण के अभूतपूर्व दावों के समानांतर पर्यावरणीय संकट भी अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच चुका है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान, घटते वन, सूखते जलस्रोत, प्रदूषित वायु, जैव विविधता का क्षरण और चरम मौसमीय घटनाएँ मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। इस संकट के अनेक कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण वैश्विक युद्धोन्माद, सैन्य प्रतिस्पर्धा और प्रभुत्ववादी राजनीति भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब साम्राज्यों, औपनिवेशिक शक्तियों और आधुनिक महाशक्तियों ने अपने राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामरिक हितों के लिए युद्धों का सहारा लिया, तब केवल मनुष्यों का ही विनाश नहीं हुआ बल्कि प्रकृति भी उसकी सबसे बड़ी शिकार बनी। जल, जंगल, जमीन और जलवायु पर युद्धों के प्रभाव कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं। आधुनिक युग में यह प्रभाव और भी व्यापक हो गया है क्योंकि आज युद्धों में प्रयुक्त तकनीक, हथियार और सैन्य अवसंरचनाएँ पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी हैं।
आधुनिक विश्व व्यवस्था की जड़ें यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार में निहित हैं। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य ने एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन किया। विशाल वन क्षेत्रों को कृषि, रेलवे और व्यापारिक उद्देश्यों के लिए नष्ट किया गया। उपनिवेशों की नदियाँ, खनिज संपदा और जैव संसाधन साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार उपयोग किए गए। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया ने आधुनिक पर्यावरणीय संकटों की आधारभूमि तैयार की। यद्यपि आज का विश्व औपचारिक उपनिवेशवाद से आगे बढ़ चुका है, किन्तु कई विद्वान “नव-उपनिवेशवाद” या “आर्थिक प्रभुत्ववाद” की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार शक्तिशाली राष्ट्र और बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट संरचनाएँ संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों पर प्रभाव बनाए रखने के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप करती हैं। मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों में संसाधनों को लेकर हुए संघर्ष इसी व्यापक संदर्भ में देखे जाते हैं।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के अनेक युद्धों ने पर्यावरण को गहरी क्षति पहुँचाई है। तेल कुओं में लगी आग, रासायनिक प्रदूषण, बमबारी से नष्ट होते वन, क्षतिग्रस्त जलस्रोत और युद्धोत्तर मलबा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को लंबे समय तक प्रभावित करते हैं। युद्ध के दौरान सैन्य वाहन, लड़ाकू विमान, मिसाइल प्रणालियाँ और भारी औद्योगिक उत्पादन विशाल मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करते हैं। कई पर्यावरण विशेषज्ञों का मत है कि वैश्विक सैन्य ढाँचा स्वयं ग्रीनहाउस गैसों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
मध्य एशिया और पश्चिम एशिया पिछले कई दशकों से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र बने हुए हैं। तेल, गैस, व्यापारिक मार्गों और सामरिक प्रभाव को लेकर विभिन्न शक्तियों के बीच संघर्षों ने क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है। इन संघर्षों का प्रभाव केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जल संसाधनों, कृषि उत्पादन और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ा है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में लाखों लोग विस्थापित हुए, जिससे शहरी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा और पर्यावरणीय चुनौतियाँ और बढ़ीं। अफ्रीका में भी अनेक संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े रहे हैं। खनिज, तेल और अन्य संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर हुए संघर्षों ने स्थानीय समुदायों और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुँचाया है। अनेक क्षेत्रों में अवैध खनन, वनों की कटाई और जल प्रदूषण ने पारिस्थितिक संतुलन को कमजोर किया है। जब राज्य संस्थाएँ संघर्षों के कारण कमजोर पड़ती हैं, तब पर्यावरणीय संरक्षण भी प्रभावित होता है।
यूरोप में हाल के वर्षों में उभरे सैन्य तनावों ने यह स्पष्ट किया है कि युद्ध किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। आधुनिक युद्ध वैश्विक ऊर्जा बाजारों, खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं और जलवायु नीतियों को प्रभावित करते हैं। रक्षा व्यय बढ़ने पर अनेक देशों के लिए पर्यावरणीय संरक्षण और हरित विकास कार्यक्रमों पर पर्याप्त संसाधन आवंटित करना कठिन हो जाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका को आधुनिक विश्व व्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति के रूप में देखा जाता है। उसके समर्थकों का तर्क है कि उसने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी विकास और वैश्विक आर्थिक स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वहीं आलोचक यह कहते हैं कि अनेक सैन्य हस्तक्षेपों और रणनीतिक अभियानों ने विभिन्न क्षेत्रों में अस्थिरता को बढ़ावा दिया। इसी प्रकार अन्य महाशक्तियों पर भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में प्रभुत्ववादी नीतियाँ अपनाने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अतः पर्यावरणीय संकट को केवल किसी एक देश या समुदाय से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा,यह व्यापक वैश्विक शक्ति-संरचना का परिणाम है।
जल आज विश्व राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों के प्रवाह, हिमनदों के आकार और वर्षा चक्र में परिवर्तन हो रहा है। ऐसे समय में यदि जल संसाधनों पर राजनीतिक या सैन्य संघर्ष बढ़ते हैं, तो मानवता के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। कई विशेषज्ञ भविष्य में जल को लेकर बढ़ने वाले संघर्षों की आशंका व्यक्त करते हैं। इसलिए जल सुरक्षा और शांति स्थापना को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वन केवल लकड़ी के स्रोत नहीं हैं; वे पृथ्वी के फेफड़े हैं। युद्धों के दौरान वन क्षेत्रों का विनाश केवल स्थानीय समस्या नहीं बल्कि वैश्विक समस्या बन जाता है। वनों के नष्ट होने से कार्बन अवशोषण क्षमता घटती है,जैव विविधता प्रभावित होती है और स्थानीय जलवायु असंतुलित होती है। अनेक संघर्ष क्षेत्रों में वन संरक्षण लगभग असंभव हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन स्वयं भी संघर्षों को बढ़ावा दे सकता है। जब सूखा, बाढ़, खाद्य संकट और संसाधनों की कमी बढ़ती है, तब सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता की संभावना भी बढ़ती है। इस प्रकार युद्ध और जलवायु परिवर्तन एक-दूसरे को प्रभावित करने वाला दुष्चक्र निर्मित कर सकते हैं। एक ओर युद्ध पर्यावरण को नष्ट करते हैं, दूसरी ओर पर्यावरणीय संकट नए संघर्षों को जन्म दे सकते हैं। वैश्विक सैन्य व्यय प्रतिवर्ष खरबों डॉलर तक पहुँच चुका है। यदि इन संसाधनों का एक महत्वपूर्ण भाग जल संरक्षण, वन पुनर्स्थापन, नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन और सतत विकास कार्यक्रमों में निवेश किया जाए तो मानवता अनेक पर्यावरणीय चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकती है। यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक भी है कि मानव सभ्यता अपनी प्राथमिकताएँ किस दिशा में निर्धारित करती है।
वर्तमान समय में आवश्यकता किसी एक राष्ट्र,जातीय समूह या ऐतिहासिक समुदाय को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उन संरचनात्मक कारणों को समझने की है जो युद्ध, संसाधन-दोहन और पर्यावरणीय विनाश को बढ़ावा देते हैं। औपनिवेशिक विरासत, अनियंत्रित उपभोक्तावाद, सैन्यीकरण, ऊर्जा राजनीति, आर्थिक असमानता और वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा—ये सभी कारक मिलकर वर्तमान संकट को जन्म देते हैं। मानव इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि प्रकृति किसी युद्ध की पक्षधर नहीं होती। युद्ध में विजेता और पराजित राष्ट्र हो सकते हैं, किन्तु पर्यावरण की दृष्टि से अंततः पूरी मानवता हारती है। प्रदूषित नदियाँ, नष्ट वन, विषाक्त मिट्टी और अस्थिर जलवायु किसी सीमा, धर्म, जाति या राष्ट्र को नहीं पहचानते। उनका प्रभाव सार्वभौमिक होता है।
अतः यदि विश्व समुदाय वास्तव में जल, जंगल, जीवन और जलवायु की रक्षा करना चाहता है, तो उसे युद्धोन्माद के स्थान पर सहयोग, प्रभुत्व के स्थान पर साझेदारी और संसाधन-दोहन के स्थान पर सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा। पर्यावरणीय न्याय और विश्व शांति एक-दूसरे के पूरक हैं। पृथ्वी का भविष्य तभी सुरक्षित हो सकता है जब मानवता यह समझे कि प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व ही वास्तविक प्रगति का मार्ग है।
- डिप्टी नोडल अधिकारी,MyGov
डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा हैं।

