चंदा चोरी पर शोर : अपनी छोटी-छोटी चोरियों पर कब होगा मंथन ?

समाज में उठे हर बड़े विवाद के बीच आत्ममंथन भी जरूरी है, क्योंकि बदलाव कानून से नहीं, बल्कि स्वबोध और जिम्मेदारी से आता है।

हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ कीर्ति कुमार

मुद्दा गर्म है..। आजकल हर ओर एक ही विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है-'चंदा चोरी'। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। जांच के लिए एसआईटी गठित हो चुकी है,ट्रस्ट के महासचिव सहित अन्य पदाधिकारियों के त्यागपत्र स्वीकार किए जा चुके हैं और कानून अपनी प्रक्रिया के अनुसार कार्य कर रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न मन में बार-बार उठता है-क्या केवल यही चोरी हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या है?

यदि हम कुछ पल स्वयं के भीतर झांकें, तो पाएंगे कि हममें से अधिकांश लोग प्रतिदिन अनजाने या जानबूझकर छोटी-छोटी चोरियां करते हैं। ऐसी चोरियां, जिन्हें शायद कानून की नजर में अपराध न माना जाए, लेकिन वे हमारे चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी पर अवश्य प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

सुबह घर से निकलते ही लालबत्ती पर रुकने के बजाय इधर-उधर देखकर यह सुनिश्चित करना कि कोई पुलिसकर्मी तो नहीं है, फिर नियम तोड़कर आगे निकल जाना, बिना हेलमेट या तीन सवारी बैठाकर वाहन चलाना; कार्यालय में समय से देर से पहुंचकर बहाने बनाना, सार्वजनिक संपत्ति को अपनी न मानना-क्या ये सब भी ईमानदारी की चोरी नहीं हैं?

वास्तविक समस्या केवल धन की चोरी नहीं, बल्कि कर्तव्य, अनुशासन और नैतिकता की चोरी है। जब तक हमें यह अनुभव नहीं होगा कि यह समाज, यह कार्यालय, यह सड़क, यह व्यवस्था और यह देश हमारा अपना है, तब तक ऐसे व्यवहार समाप्त नहीं होंगे।

कोई भी कानून,अदालत या जांच एजेंसी समाज से इन छोटी-छोटी चोरियों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। इनका समाधान केवल स्वबोध और अपनेपन की भावना में निहित है। यह भावना एक दिन में विकसित नहीं होती, बल्कि निरंतर अभ्यास, संस्कार और आत्मअनुशासन से जागृत होती है। जैसे कुएं से प्रतिदिन पानी निकालने वाली साधारण रस्सी भी समय के साथ पत्थर पर निशान बना देती है, उसी प्रकार सतत सकारात्मक चिंतन और आचरण व्यक्ति के भीतर स्थायी परिवर्तन ला सकता है।

जब हम इस धरती को अपनी माता, इस समाज को अपना परिवार और इस राष्ट्र को अपना दायित्व मानेंगे, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। इतिहास में अनेक महापुरुषों ने इसी आत्मबोध, अनुशासन और राष्ट्रभाव की प्रेरणा दी है। आवश्यकता केवल उनके बताए मार्ग पर चलने की है।

आज चर्चा का एक विषय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं को गुरु न मानकर सनातन प्रेरणा के प्रतीक परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु स्थान दिया। उनका विचार था कि व्यक्ति में गुण-दोष दोनों हो सकते हैं, इसलिए आदर्श किसी व्यक्ति विशेष के बजाय शाश्वत मूल्यों को बनाना चाहिए।

यदि हम भी अपने जीवन में स्वबोध,अनुशासन और राष्ट्रभाव को स्थान दें, तो न केवल बड़ी चोरियां कम होंगी, बल्कि वे छोटी-छोटी चोरियां भी समाप्त होंगी,जो प्रतिदिन हमारे चरित्र को कमजोर करती हैं।आइए,दूसरों पर उंगली उठाने से पहले स्वयं का आत्ममंथन करें। क्योंकि समाज का वास्तविक परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है।

भारत माता की जय..🙏

लेखक- सामाजिक 'चिंतक एवं विश्लेषक' हैं।