स्व.मैथिली शरण गुप्त जी की जयंती " 3 अगस्त" पर विशेष : उर्मिला की संवेदनाओं का सागर "साकेत" !


हिन्दुस्तान वार्ता। ✍️ आदर्श नन्दन गुप्ता,वरिष्ठ पत्रकार 

साकेत यानि अयोध्या।

साकेत यानि कृष्ण।

साकेत अर्थात लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की संवेदनाओं का छलकता सागर।

 साकेत के और भी बहुत से अर्थ हो सकते हैं, उपमाएं भी हो सकती हैं, लेकिन हम चर्चा कर रहे हैं राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के महाकाव्य “साकेत” की, जिसकी ये पंक्तियां हिंदी का हर छात्र गुनगुनाता है-

"राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या ?

विश्व में रमे हुए नहीं, सभी कहीं हो क्या ?

तब मैं निरीश्वर हूँ,ईश्वर क्षमा करें,

तुम न रमो तो, मन तुम में रमा करे ।"

'साकेत' हिंदी साहित्य की अनमोल मुक्तामणि है। महर्षि वाल्मीकि ने तो देवी उर्मिला की चर्चा अपने ‘रामायण’ में की है, लेकिन महाकवि तुलसीदास ने उर्मिला के त्याग, समर्पण का आकलन कम किया है। परिणाम यह हुआ कि आम व्यक्ति ही नहीं, सुविज्ञजन भी उर्मिला के इस त्याग से अनभिज्ञ रहे। राष्ट्रकवि को यह वेदना हुई और संभवतः वे पहले कवि होंगे, जिन्होंने उर्मिला के जीवन का मूल्यांकन किया। क्योंकि माता सीता तो श्रीराम के साथ वन गमन कर गईं, लेकिन  देवी उर्मिला  साकेत में ही रह गईं। उसी “साकेत” में कवि ने  देवी उर्मिला का करुण चित्रण किया है, लेकिन यह कदापि न समझा जाए कि कवि ने श्री राम के महत्व को कम आंका है,बल्कि श्रीराम के प्रति इस महाकाव्य में भक्तिभाव ही प्रदर्शित किये हैं।

 श्री राम के जन्म पर 'साकेत' में लिखा है कि -

"किसलिए यह खेल प्रभु ने है किया ।

मनुज बनकर मानवी का पय पिया ॥

भक्त वत्सलता इसी का नाम है,

और वह लोकेश लीला धाम है ।"

गुप्त जी ने लिखा है-

"मानस-मन्दिर में सती, पति की प्रतिमा थाप,

जलती-सी उस विरह में, बनी आरती आप।"

अर्थात- उर्मिला के ह्रदय में अपने पति की ही प्रतिमा है, लेकिन वह विरह से व्याकुल हैं और  किसी आरती की लौ के समान स्वयं जल रही हैं।

उर्मिला ने अपनी राजसी सुविधाओं को त्याग दिया था, वे विरह ताप में तप रही थीं। इस भावना को कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है -

"आँखों में प्रिय-मूर्ति थी,भूले थे सब भोग।

हुआ योग से भी अधिक, उसका विषम-वियोग।।"

"आठ पहर चौंसठ घड़ी, स्वामी का ही ध्यान।

छूट गया पीछे स्वयं, उसका आत्मज्ञान।।'

'साकेत' में भगवान श्रीराम का भी अद्भुत गुणगान किया है। सप्तम सर्ग में पृष्ठ 115 पर राष्ट्रकवि लिखते हैं-

"कंठ-कंठ गा उठा,शून्य-शून्य छा उठा।

सत्य काम सत्य है, राम नाम सत्य है ।"

“साकेत” का नवीतम संस्करण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के पत्राचार के साथ प्रकाशित हुआ है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने श्री गुप्त के पत्र का उत्तर देते हुए 5 अप्रैल सन् 1932 लिखा-

"..तुलसीदास ने उर्मिला के बारे में बहुत कुछ नहीं कहा, यह दोष माना गया है। मैंने इस अभाव को दोष दृष्टि से नहीं देखा। मुझमें उसमें कवि की कला प्रतीत हुई। मानस की रचना ऐसी है कि उर्मिला जैसे योग्य पात्र का उल्लेख अध्याहार (अधूरापन) में रखा गया है और उसी काव्य में उन पात्रों का महत्व है। उर्मिला इत्यादि के गुणों का वर्णन सीता के गुण विशेष बताने के लिए ही आ सकता था। परंतु उर्मिला के गुण सीता से कम थे ही नहीं।"

श्री द्विवेदी जी के प्रकाशित पत्र में 'साकेत' के बारे में लिखा है कि -

"निश्चय ही यह काव्य आपकी ग्रंथ माला का शिरोमणि होगा। आपने बड़ा काम किया है, बहुत नाम किया है। (27-07-1931)

श्री मैथिलीशरण गुप्त का 'साकेत' ही नहीं, अन्य महाकाव्य भी अमर कृति बन गए हैं। 'यशोधरा' महाकाव्य में लिखी ये पंक्तियां सर्वाधिक लोकप्रिय रही हैं-

"सखि, वे मुझसे कहकर जाते,

कहते, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते ?"

इन पंक्तियों में इसमें गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा के स्वाभिमानी रूप का वर्णन किया गया है।

इसी प्रकार एक काव्य पंक्ति भी गुप्त जी की सर्वत्र उपयोग में आती है-

"अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी,

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।"

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि थे। उनकी कृति 'भारत-भारती' (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और इसी कारण महात्मा गांधी जी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी थी। सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। 'पंचवटी' 'जयद्रथ वध', 'यशोधरा' और 'साकेत' उनकी महत्वपूर्ण कृ़तियां हैं। 'साकेत' इन सभी में सर्वोच्च शिखर पर है।

लेखक- वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यसेवी हैं।

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