यूएन में बोला भारत- खाड़ी में रह रहे 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा सर्वोपरि



हिन्दुस्तान वार्ता। ब्यूरो

न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 'मध्य पूर्व में राजनीतिक समाधान को आगे बढ़ाना: स्थायी शांति के लिए मध्यस्थता और बातचीत' विषय पर आयोजित एक खुली बहस में भारत ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इसके प्रतिकूल प्रभावों को लेकर वैश्विक मंच पर देश का पक्ष रखा।

न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में भारत के स्थायी मिशन ने एक बयान में बताया कि भारतीय राजदूत हरीश ने स्पष्ट किया कि ईरान और खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव के कारण उत्पन्न हुई तबाही से भारत बेहद चिंतित है। उन्होंने रेखांकित किया कि खाड़ी क्षेत्र में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं। उनकी सुरक्षा भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसके साथ ही, व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमलों का पुरजोर विरोध करते हुए उन्होंने समुद्री नेविगेशन की स्वतंत्रता को बहाल करने की मांग की, क्योंकि इस कार्यबल में बड़ी संख्या में भारतीय शामिल हैं।

भारतीय मिशन ने बताया गाजा की स्थिति पर भारत ने तत्काल और स्थायी युद्धविराम, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-स्टेट सॉल्यूशन) के आधार पर एक संप्रभु और स्वतंत्र फिलिस्तीन स्टेट की स्थापना का समर्थन किया। भारत ने यूएनआरडब्ल्यूए को दी जाने वाली सालाना 50 लाख डॉलर की सहायता की पहली किस्त (25 लाख डॉलर) जल्द ही सौंपने की बात भी कही। लेबनान के संदर्भ में, भारत ने उसकी संप्रभुता का सम्मान करने और यूएन शांति सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की, जिसमें भारतीय सैनिक भी तैनात हैं। वहीं, यमन संकट पर भारत ने बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य और लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा को एक साझा वैश्विक जिम्मेदारी बताया।

हरीश ने वैश्विक शांति बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र की गिरती साख और प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भर में चल रहे युद्धों को रोकने में संयुक्त राष्ट्र की विफलता का मुख्य कारण सुरक्षा परिषद की आठ दशक पुरानी और आउटडेटेड वास्तुकला है। भारत ने सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार कर इसे समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाने पर जोर दिया, ताकि संयुक्त राष्ट्र भविष्य की चुनौतियों से निपटने में प्रासंगिक बना रहे।

(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)